कलकत्ता उच्च न्यायालयनें बंगाल हिंसाके राजनीतिक वक्तव्योंपर ‘अङ्कुश’ लगाकर दिखाया मार्ग
२० अगस्त, २०२१
बंगालमें विधानसभा चुनाव परिणामके आनेके पश्चात हुई हिंसाके प्रकरणमें कलकत्ता उच्च न्यायालयने अपने निर्णयमें हिंसाके मध्य हुई हत्या व दुष्कर्मके प्रकरणोंकी ‘सीबीआई’ जांचके आदेश दिए हैं । साथ ही पांच न्यायाधीशोंवाली पीठने एक ‘एसआईटी’के गठनका भी आदेश पारित किया है, जो हिंसाके मध्य हुए अन्य अपराधिक घटनाओंकी जांच करेगा । उच्च न्यायालयने बंगाल शासनको यह भी आदेश दिया है कि राज्य शासन हिंसामें प्रभावित नागरिकोंके लिए शीघ्रातिशीघ्र सहायता प्रदान करे । वहीं न्यायालयनें उन प्रतिवादोंको (दावोंको) भी निरस्त कर दिया, जिसमें राज्य शासनने मानवाधिकार आयोगपर पक्षपातका आरोप लगाया था । न्यायालयने ‘सीबीआई’ व ‘एसआईटी’को जांच प्रतिवेदन ६ सप्ताहके भीतर प्रस्तुत करनेको भी कहा है । इस प्रकरण अन्तर्गत न्यायालयने ३ अगस्तको ही अपने निर्णयको सुरक्षित रख लिया था । अब इस निर्णयके पश्चात राज्यमें चुनावोंके उपरान्त हुई हिंसाको लेकर सत्ताधारी और विपक्षी दलोंके मध्य चल रहे आरोप और प्रत्यारोपोंपर विराम लग गया है । न्यायालयका आदेश यह बतानेके लिए भी पर्याप्त है कि ममता बनर्जीका शासन अब हिंसाको केवल विपक्षी दलपर आरोप लगाकर निरस्त नहीं कर सकती ।
यह दु:खद है कि चुनावके पश्चात हुई भीषण हिन्दू विरोधी हिंसाको रोकनेका प्रथम प्रयास न्यायपालिकाके सौजन्यसे हुआ है । यदि सत्ताधारी दल व केन्द्र शासन इस प्रयासमें अपना योगदान यथासमय देते तो यह देशमें स्वस्थ लोकतान्त्रिक वातावरण स्थापित करनेकी दिशामें महत्त्वपूर्ण प्रयास होता; परन्तु ऐसा नहीं हुआ । जिससे स्पष्ट होता है कि भारतमें लोकतन्त्र पूर्णतः विफल सिद्ध हो रहा है । – सम्पादक, वैदिक उपाासना पीठ
स्रोत : ऑप इंडिया
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