आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं-समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत् । तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी ॥ – श्रीमद भगवद्गीता (२.७०) अर्थ : जैसे नाना नदियोंके जल सब ओरसे परिपूर्ण, अचल प्रतिष्ठा वाले समुद्रमें उसको विचलित न करते हुए ही समा जाते हैं, वैसे ही सब भोग जिस स्थितप्रज्ञ पुरुषमें किसी प्रकारका विकार उत्पन्न किए बिना ही समा जाते […]
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् । स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ॥ – श्रीमदभगवद्गीता (३: ३५) अर्थ : अच्छी प्रकार आचरणमें लाए हुए दूसरेके धर्मसे गुण रहित भी अपना धर्म अति उत्तम है। अपने धर्ममें तो मरना भी कल्याणकारक है और दूसरेका धर्म भयको देनेवाला है | भावार्थ : कलियुगके आरंभ होने तक मात्र एक ही धर्म […]
क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति । कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति || – श्रीमदभगवद्गीता (९:३१) अर्थ : वह शीघ्र ही धर्मात्मा हो जाता है और सदा रहनेवाली परम शान्तिको प्राप्त होता है । हे अर्जुन ! तू निश्चयपूर्वक सत्य जान कि मेरा भक्त नष्ट नहीं होता | भावार्थ : दुराचारी यदि अनन्य भक्ति करे […]
शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात् । कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः ॥ – श्री मदभगवद्गीता (५:२३) अर्थ : जो साधक इस मनुष्य शरीरमें, शरीरका नाश होनेसे पहले-पहले ही काम-क्रोधसे उत्पन्न होनेवाले वेगको सहन करनेमें समर्थ हो जाता है, वही पुरुष योगी है और वही सुखी है | भावार्थ : जब तक यह शरीर है […]
नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः । अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः ॥ – श्रीमदभगवद्गीता (५:१५) अर्थ : सर्वव्यापी परमेश्वर भी न किसीके पाप कर्मको और न किसीके शुभकर्मको ही ग्रहण करते हैं, किन्तु अज्ञानद्वारा ज्ञान ढंका हुआ है, उसीसे सब अज्ञानी मनुष्य मोहित हो रहे हैं | भावार्थ : परमेश्वर यद्यपि इस सृष्टिके रचियता […]
यत्साङ्ख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्यौगैरपि गम्यते । एकं साङ्ख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति ॥ अर्थ : ज्ञान योगियोंद्वारा जो परमधाम प्राप्त किया जाता है, कर्मयोगियोंद्वारा भी वही प्राप्त किया जाता है। इसलिए जो पुरुष ज्ञानयोग और कर्मयोगको फलरूपमें एक देखता है, वही यथार्थ देखता है | – श्रीमदभगवद्गीता (५ : ५ ) भावार्थ : […]
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि । तथा शरीराणि विहाय जीर्णा- न्यन्यानि संयाति नवानि देही ॥ श्रीमद भगवदगीता – (२:२२ ) अर्थ : जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रोंको त्यागकर दूसरे नए वस्त्रोंको ग्रहण करता है, वैसे ही जीवात्मा, जीर्ण शरीरोंको त्यागकर दूसरे नए शरीरोंको प्राप्त होती है | भावार्थ : मनुष्यका यह शरीर नश्वर है […]
सर्वोपनिषदो गाव: दोग्धा गोपालनंदन: | पार्थो वत्स: सुधी: भोक्ता दुग्धं गीतामॄतं महत् || सभी उपनिषद गौ समान हैं, गोपालनंदन( भगवान श्रीकृष्ण) उनके रखवाले हैं | पार्थ (अर्जुन ) बछडे समान हैं जो उस दुग्धका रसपान करते हैं और श्रीमदभगवद्गीता उन गायोंके दुग्ध है |
इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते । तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि ॥ अर्थ : क्योंकि जैसे जलमें चलनेवाली नावको वायु हर लेती है, वैसे ही विषयोंमें विचरती हुई इन्द्रियोंमें से मन जिस इन्द्रियके साथ रहता है, वह एक ही इन्द्रिय इस अयुक्त पुरुषकी बुद्धिको हर लेती है | – श्रीमदभगवद्गीता (२: ६७) भावार्थ : इंद्रियोका निग्रह साधकके […]
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः । स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥ – श्रीमदभगवद्गीता (३: २१) अर्थ : श्रेष्ठ पुरुष जो-जो आचरण करता है, अन्य पुरुष भी वैसा-वैसा ही आचरण करते हैं। वह जो कुछ प्रमाण कर देता है, समस्त मनुष्य-समुदाय उसीके अनुसार बरतने लग जाता है | भावार्थ : धर्मकी एक परिभाषा यह भी है कि जिस […]