लोकाभिरामं रनरङ्गधीरं राजीवनेत्रं रघुवंशनाथम् । कारुण्यरूपं करुणाकरंतं श्रीरामचंद्रं शरणं प्रपद्ये ।। अर्थ : मैं सम्पूर्ण लोकोंमें सुन्दर तथा रणक्रीडामें धीर, कमलनेत्र, रघुवंश नायक, करुणाकी मूर्ति और करुणाके भण्डार रुपी श्रीरामकी शरणमें हूं |
सरस्वति महाभागे विद्ये कमललोचने । विद्यारूपे विशालाक्षि देहि नमोऽस्तु ते।। अर्थ : हे महाभाग्यवती ज्ञानस्वरूपा कमलके समान विशाल नेत्रवाली ज्ञानदात्री सरस्वती ! मुझे विद्या दो, मैं तुम्हें प्रणाम करता हूं ।
रौद्रायै नमो नित्यायै गौर्यै धात्र्यै नमो नमः । ज्योत्स्नायै चेन्दुरुपिण्यै सुखायै सततं नमः ॥ अर्थ : रौद्राको नमस्कार है । नित्या, गौरी एवं धात्रीको बारम्बार नमस्कार है । ज्योत्स्नामयी, चन्द्ररूपिणी एवं सुखस्वरूपा देवीको सतत प्रणाम है ।
सर्वमंगलमांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके । शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तुते ।। अर्थ : मंगल वस्तुओंमें मंगलरूप, कल्याणदायिनी, सर्व पुरुषार्थ साध्य करानेवाली, शरणागतोंका रक्षण करनेवाली हे त्रिनयने, गौरी, नारायणी ! आपको मेरा नमस्कार है ।
शान्तं शाश्वतमप्रमेयमनघं निर्वाणशान्तिप्रदं
ब्रह्माशंभुफणीन्द्रसेव्यमनिशं वेदांतवेद्यं विभुम्।
रामाख्यं जगदीश्वरं सुरगुरुं मायामनुष्यं हरिं
वन्देऽहं करुणाकरं रघुवरं भूपालचूडामणिम् ॥……
नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः | नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणताः स्म ताम् || अर्थ : उन देवीको नमन है जो देवियोंकी देवी है, जो शिवकी प्रिया हैं | उन देवीके हम शरणागत हैं, उन्हें वंदन हैं, जो सृष्टिमें प्रकृति स्वरूपमें व्याप्त हैं और जो मंगलदायिनी हैं !
नमस्तेस्तु महामाये श्रीपीठे सुरपूजिते ।
शङ्खचक्रगदाहस्ते महालक्ष्मि नमोस्तु ते ॥१॥
अर्थ : इन्द्र बोले – श्रीपीठपर स्थित और देवताओंसे पूजित होनेवाली हे महामाये, तुम्हें नमस्कार है। हाथमें शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाली हे महालक्ष्मी, तुम्हें प्रणाम है ।…….
क्षीरोदन्वत्प्रदेशे शुचिमणिविलसत्सैकते मौक्तिकानां मालाकॢप्तासनस्थः स्फटिकमणिनिभैर्मौक्तिकैर्मण्डिताङ्गः। शुभ्रैरभ्रैरदभ्रैरुपरिविरचितैर्मुक्तपीयूष वर्षैः आनन्दी नः पुनीयादरिनलिनगदा शङ्खपाणिर्मुकुन्दः।। अर्थ : भक्तोंको मोक्ष प्रदान करनेवाले उन शेषशायी विष्णुको नमन कर उन्हें हमें पवित्र करने हेतु प्रार्थना करते हैं जो क्षीरसागरमें जहां चमकते हुए स्फटिक मणियोंके मध्य मोतियोंकी मालासे सुशोभित सिंहासनपर आरूढ हैं, जो श्वेत मेघरूपी छत्रसे आच्छादित हैं और वे मेघ ऐसे अमृत […]
तदेव लग्नं सुदिनं तदेव
ताराबलं चंद्रबलं तदेव |
विद्याबलं दैवबलं तदेव
लक्ष्मीपते तेंघ्रियुगं स्मरामि ||…….
त्रिपुरसुन्दरी अष्टकम् ॥ कदम्बवनचारिणीं मुनिकदम्बकादम्बिनीं नितम्बजितभूधरां सुरनितम्बिनीसेविताम् । नवाम्बुरुहलोचनां अभिनवाम्बुदश्यामलां त्रिलोचनकुटुम्बिनीं त्रिपुरसुन्द्रीमाश्रये ॥ १ ॥ कदम्बवनवासिनीं कनकवल्लकीधारिणीं महार्हमणिहारिणीं मुखसमुल्लसद्वारुणीम् । दयाविभवकारिणीं विशदलोचनीं चारिणीं त्रिलोचनकुटुम्बिनीं त्रिपुरसुन्दरीमाश्रये ॥ २ ॥ कदम्बवनशालया कुचमरोल्लसन्मालया कुचोपमितशैलया गुरुकृपालसद्वेलया । मदारुणकपोलया मधुरगीतवाचालया कयाऽपि घननीलया कवचिता वयं लीलया ॥ ३ ॥ कदम्बवनमध्यगां कनकमण्डलोपस्थितां षडम्बुरुहवासिनीं सततसिद्धसौदामिनीम् । विडम्बितजपारुचिं विकचचन्द्रचूडामणीं त्रिलोचनकुटुम्बिनीं त्रिपुरसुन्दरीमाश्रये ॥ ४ ॥ […]