श्रीराम स्तुति


शान्तं शाश्वतमप्रमेयमनघं निर्वाणशान्तिप्रदं
ब्रह्माशंभुफणीन्द्रसेव्यमनिशं वेदांतवेद्यं विभुम्‌।
रामाख्यं जगदीश्वरं सुरगुरुं मायामनुष्यं हरिं
वन्देऽहं करुणाकरं रघुवरं भूपालचूडामणिम्‌ ॥
अर्थ :
शान्त, सनातन, अप्रमेय (प्रमाणोंसे परे), निष्पाप, मोक्षरूप परमशान्ति देनेवाले, ब्रह्मा, शम्भु और शेषसे निरन्तर सेवित, वेदांतके द्वारा जानने योग्य, सर्वव्यापक, देवताओंमें सबसे बडे, मायासे मनुष्य रूपमें दिखनेवाले, समस्त पापोंको हरनेवाले, करुणाके सागर, रघुकुलमें श्रेष्ठ तथा राजाओंके शिरोमणि, राम कहलानेवाले जगदीश्वरकी मैं वंदना करता हूं ॥



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