देवस्तुति

॥ भज गोविन्दम् ॥


भजगोविन्दं भजगोविन्दं गोविन्दं भज मूढमते । संप्राप्ते सन्निहिते काले नहि नहि रक्षति डुकृञ्करणे ॥ १ ॥ मूढ जहीहि धनागमतृष्णां कुरु सद्बुद्धिं मनसि वितृष्णाम् । यल्लभसे निजकर्मोपात्तं वित्तं तेन विनोदय चित्तम् ॥ २ ॥ नारीस्तनभर नाभीदेशं दृष्ट्वा मागामोहावेशम् । एतन्मांसावसादि विकारं मनसि विचिन्तय वारं वारम् ॥ ३ ॥ नलिनीदलगत जलमतितरलं तद्वज्जीवितमतिशयचपलम् । विद्धि व्याध्यभिमानग्रस्तं लोकं शोकहतं […]

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हनुमान स्तुति


बुद्धिर्बलं यशो धैर्यं निर्भयत्वमरोगता। अजाड्यं वाक्पटुत्वं च हनूमत्स्मरणाद्भवेत् ।। अर्थ : हनुमानजीका समरण करनेसे हमें बुद्धि, बल, धैर्य, निर्भयता, आरोग्य , विवेक एवं वाकपटुताकी प्राप्ति होती है !

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शिव स्तुति


अपसर्पन्तु ते भूता ये भूता भूमिसंस्थिताः । ये भूता विघ्नकर्तारस्ते गच्छन्तु शिवाज्ञया ।। अर्थ : जो भी अनिष्टकारी जीवात्माएं पृथ्वीपर है वे सब दूर हों, वे अनिष्ट जीवात्माएं जो विघ्न निर्माण करती हैं, वे शिवाज्ञा अनुरूप दूर हों।

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अष्टांग प्रणाम (वंदन)


उरसा शिरसा दृष्ट्या मनसा वचसा तथा । पद्भ्यां कराभ्यां जानुभ्यां प्रणामोऽष्टाङ्ग उच्यते ।। अर्थ : हृदय, मस्तक, नेत्र, मन, वाणी , चरण, हस्त और घुटनेसे शरणागत होनेको अष्टांग प्रणाम ( वंदन ) कहते हैं।

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नारायण स्तुति


सा बुद्धिर्विमलेन्दुशंखधवला या माधवव्यापिनी । सा जिह्वा मृदु भाषिणी नृप मुहुर्या स्तौति नारायणम् ॥ अर्थ : वही बुद्धि निर्मल और चन्द्रमा तथा शंखके समान उज्ज्वल है, जो सदा भगवान माधवके चिंतनमें संलग्न रहती है तथा वही जिह्वा मधुरभाषिणी है, जो बारम्बार भगवान नारायणका स्तवन किया करती है ।

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मधुराष्टकं


अधरं मधुरं वदनं मधुरं नयनं मधुरं हसितं मधुरम् ।
हृदयं मधुरं गमनं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥१॥
अर्थ : आपके होंठ मधुर हैं, आपका मुख मधुर है, आपके नेत्र मधुर हैं, आपकी हंसी मधुर है, आपका हृदय मधुर है, आपकी चाल मधुर है, मधुरताके ईश, श्रीकृष्ण आपका सब कुछ मधुर है |

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विष्णु स्तुति


नमः कमलनाभाय नमस्ते जलशायिने । नमस्ते केशवानन्त वासुदेव नमोऽस्तुते ।। अर्थ : उन कमलनाभाय विष्णुको नमन जो जलमें शयन करते हैं । केशवको नमन है, उन वासुदेवको नमन है !  

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हनुमान स्तुति


यत्र यत्र रघुनाथ कीर्तनं तत्र तत्र कृतमस्तकाञ्जलिम् । भाष्पवारि परिपूर्ण लोचनं मारुतिं नमत राक्षसान्तकम् ।। अर्थ : जहां -जहां भगवान श्रीरघुनाथकी  संकीर्तन होता है, वहां शरणागत मस्तक, जुडे  हुए हस्त कमल और नेत्रोंमें भावपूर्ण आनंद अश्रुके साथ उपस्थित होते हैं , ऐसे राक्षसोंका संहार करनेवाले, श्रीहनुमानको हमारा कोटिश: प्रणाम !  

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शिव स्तुति


ॐ शिव ॐ शिव, परात्परा शिव ओंकार शिव तव शरणम् । नमामि शंकर भजामि शंकर उमामहेश्वर तव शरणम् ।। अर्थ : ॐ शिव ॐ शिव ओंकार स्वरूपी परात्पर शिवके हम शरणागत है । हम शंकरको नमन करते हैं, उनका भजन करते हैं, हम उमा और शंकरके शरणागत हैं ।    

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विष्णु स्तुति


मङ्गलं भगवान्विष्णुर्मङ्गलं गरुडध्वजः । मङ्गलं पुण्डरीकाक्षो मङ्गलायतनं हरिः ।। अर्थ : भगवान विष्णु मंगल (शुभ करनेवाले हैं या उनका दर्शन मंगलकारी है ) हैं और मंगल है उनके गरुडका प्रतीक लिए ध्वज, मंगल है उनके कमलरूपी नयन, मूलत: वे मंगलयातन हैं ।

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