ध्यायेदाजानुबाहुं धृतशरधनुषं बद्धपद्मासनस्थम् । पीतं वासो वसानं नवकमलदलस्पर्धिनेत्रं प्रसन्नम् । वामांकारूढ सीतामुखकमलमिलल्लोचनं नीरदाभम्। नानालंकारदीप्तं दधतमुरुजटामंडनं रामचंद्रम् ।। अर्थ : हम लंबे बाहु वाले, श्याम रंगके बादल समान परंतु आभायुक्त, नाना अलंकारोंसे आभूषित एवं जटा मंडित भगवान श्री रामचंद्रका हम ध्यान करते हैं, जिन्होंने धनुष धारण कर किया है और जो पद्मासनमें विराजमान हैं , जिनके वस्त्र […]
नित्यानन्दकरी वराभयकरी सौन्दर्य रत्नाकरी निर्धूताखिल घोरपावनकरी प्रत्यक्षमाहेश्वरी । प्रालेयाचलवंशपावनकरी काशीपुराधीश्वरी भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ।। अर्थ : नित्य आनंद प्रदायिनी, वर और अभयदायिनी, सौन्दर्यकी प्रतिमूर्ति , सम्पूर्ण दुखोंको हरनेवाली , प्रत्यक्ष माहेश्वरी , हिमवंशको पवित्र करनेवाली काशीकी अधीश्वरी , कृपा और आश्रय प्रदान करनेवाली, हे मां अन्नपूर्णेश्वरी मुझे भिक्षा दें ।
यतो धर्मस्तत: कृष्णो यत: कृष्णस्तत: जय : ।। अर्थ : जहां धर्म है (सनातन धर्म) वहां कृष्ण हैं और जहां कृष्ण हैं वहां तो विजय अवश्यंभावी है !
कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने , प्रणत क्लेश नाशाय गोविन्दाय नमो नमः । अर्थ : वासुदेवनन्दन परमात्मा स्वरूपी भगवान श्रीकृष्णको वंदन है, उन गोविंदको पुनः नमन है, वे हमारे कष्टोंका नाश करें !
नमोऽस्तु रामाय सलक्ष्मणाय देव्यै च तस्यै जनकात्मजायै । नमोऽस्तु रुद्रेन्द्र यमनिलेभ्यो नमोऽस्तु चन्द्राग्नि मरुत्गणेभ्यः ।। अर्थ : माता सीताको अशोक वाटिकामें न ढूंढ पानेपर हनुमानजी सर्व देवोंसे सहायता हेतु आर्ततासे इस प्रकार प्रार्थना करते हैं ” प्रभु श्री राम सह लक्ष्मण एवं जनक पुत्री सीता माताको नमन करता हूं, भगवान शिव सह समस्त रुद्रोंको भी […]
अनायासेन मरणं विना दैन्येन जीवनम् । देहान्ते तव सायुज्यं देहि मे पार्वतीपते ॥ अर्थ : सहजतासे मृत्यु, बिना कष्टके जीवन और देहांतके पश्चात सायुज्य मुक्ति(आपसे एकरूपता ), हे पार्वतीपति, यह सब देनेकी कृपा करें !
ॐ विष्णुं जिष्णुं महाविष्णुं प्रभविष्णुं महेश्वरम् । अनेकरूपं दैत्यान्तं नमामि पुरुषोत्तमम् ।। अर्थ : उन विष्णुको हम वंदन करते हैं जो अजेय हैं , महाविष्णु हैं , महेश्वर है , सभीके स्वामी हैं , जो असुरोंके संहारकर्ता हैं , जिनके अनेक स्वरूप हैं और जो पुरुषोत्तम हैं !
पद्मानने पद्मविपद्मपत्रे पद्मप्रिये पद्मदलायताक्षि । विश्वप्रिये विष्णुमनोऽनुकूले त्वत्पादपद्मं मयि सन्निधत्स्व ।। अर्थ : पद्मके (कमल पुष्प ) समान मुखवाले, बिना पत्र एवं विघ्नवाले पद्म समान, पद्मप्रिय, पद्म समान नयनवाले,विश्वप्रिय – हे मनको भानेवाले श्री विष्णु अपने पद्मरूपी चरणोंके सान्निध्यमें हमें रखें !
॥ श्रीरामरक्षास्तोत्रम् ॥ श्रीगणेशायनम: । अस्य श्रीरामरक्षास्तोत्रमन्त्रस्य । बुधकौशिक ऋषि: । श्रीसीतारामचंद्रोदेवता । अनुष्टुप् छन्द: । सीता शक्ति: । श्रीमद्हनुमान् कीलकम् । श्रीसीतारामचंद्रप्रीत्यर्थे जपे विनियोग: ॥ अर्थ : इस राम रक्षा स्तोत्र मंत्रके रचयिता बुधकौशिक ऋषि हैं, सीता और रामचंद्र देवता हैं, अनुष्टुप छंद हैं, सीता शक्ति हैं, हनुमानजी कीलक है तथा श्रीरामचंद्रजीकी प्रसन्नताके लिए […]
न अहं जानामि केयुरे, नाहं जानामि कुण्डले । नूपुरे तु अभिजानामि नित्यं पादाभिवन्दनात् ।। – रामायण अर्थ : जब रावण सीताका अपहरण कर ले जा रहा था तब सीता माताने चिन्हके रूपमें अपने आभूषण मार्गमें फेंक दिये जिससे कि प्रभु श्री रामको उन्हें ढूंढनेमें सहायता हो । जब प्रभु श्री राम अपने भ्राता लक्ष्मणको वे आभूषण […]