एक व्यक्तिने कुछ दिवस पूर्व एक गोष्ठीमें पूछा था कि जाति आधारित संघर्षसे यह समाज मुक्त कैसे हो सकता है ?
स्वतन्त्रता पश्चात सत्तासीन शासनकर्ताओंने इस निधर्मी लोकतन्त्रमें जातिको आधार बनाकर राज किया है और इसके पोषण हेतु जातिगत संघर्षको बढावा दिया है; इसलिए इस संघर्षको रोकनेका एकमात्र पर्याय है…..
इस देशमें यदि शिक्षण व्यवस्थामें मात्र भिन्न विषयोंके प्रायोगिक पक्षको भी सिखाया जाता तो आज इतनी बेरोजगारी नहीं होती ! पूर्व कालमें जब विद्यार्थी गुरुकुलसे घर जाते थे तो अपनी शैक्षणिक कालमें अर्जित ज्ञानसे वे सहजतासे अपनी जीविकोपार्जन कर पाते थे । हमें पुनः उसी पुरातन गुरुकुल पद्धतिसे इस देशमें लागू करनेकी आवश्यकता है, इस […]
निधर्मी लोकतन्त्रने सात दशकमें इस देशकी यह स्थिति कर दी है कि आज सौ कोटिवाले इस हिन्दू बहुल देशमें कहीं कांवड यात्रापर आक्रमण कर कांवडियोंके साथ मारपीट की जाती है तो कहीं नवरात्रिमें मां दुर्गाके विसर्जनपर तो कहीं रामनवमीकी शोभाभायात्रापर धर्मान्धोंद्वारा पत्थर बरसाए जाते हैं ! क्या इसी दिनको देखने हेतु इस देशके लाखों सपूतोंने […]
हिन्दू राष्ट्रमें ईद हो या बकरीद, एक भी गोवंशकी हत्या नहीं होगी ! गोवंशकी हत्या एवं पशुवधकी इस घृणित क्रीडाको रोकने हेतु हिन्दू राष्ट्रकी स्थापना अति आवश्यक है !
समाजमें जातिगत विषमताओंको दूर करनेके स्थानपर आजके सत्तालोलुप नेता, उसे और बढा रहे हैं, इससे यह स्पष्ट होता है कि उन्हें राष्ट्रहित और समाजहितकी चिन्ता नहीं है, मात्र अपने सत्ताको पानेकी या बनाए रखनेकी चिन्ता है ! ऐसे स्वार्थान्ध नेताओंसे हिन्दू राष्ट्रकी स्थापनाकी कल्पना करना भी व्यर्थ है !
मात्र सात दशकोंमें इस देशमें नैतिकताका इतना पतन हुआ है कि आज दूध, फल, शाक (तरकारी) जैसी अति आवश्यक वस्तुएं भी शुद्ध नहीं मिलती हैं, प्रत्येक वस्तुमें मिलावट और प्रत्येक क्षेत्रमें भ्रष्टाचार इस देशकी अब नियति बन गई है ! ऐसे निधर्मी लोकतन्त्रका परित्याग कर हिन्दू राष्ट्रकी स्थापना करना अपरिहार्य हो गया है ।
वर्ण और जातिमें क्या भेद है ?, यह आजके सामान्य हिन्दुओंको ज्ञात नहीं, इससे ही समझमें आता है कि निधर्मी लोकतन्त्रने धर्मशिक्षणसे दूर कर, हिन्दुओंकी कितनी दुर्गति कर दी है ! वर्ण गुण-कर्म आधारित होता है और हमारी वैदिक संस्कृति सदैव ही वर्ण आधारित रही है और इसकी पुनर्स्थापना यदि शीघ्र नहीं की गई तो […]
इस तथाकथित धर्मनिरपेक्षताके कारण इस देशमें अहिन्दुओंका मनोबल दिन-प्रतिदिन बढता जा रहा है, इससे पहलेकी इस देशका हिन्दू अपना धैर्य खो दे, ऐसे राष्ट्रद्रोही तत्त्वोंके विरुद्ध कठोर वैधानिक (कानूनी) कार्यवाही होनी चाहिए !
सत्तालोलुप नेता कभी भी आरक्षणको समाप्त नहीं कर सकते हैं; इस हेतु हिन्दू राष्ट्रकी स्थापना करना ही एकमात्र उपाय है; क्योंकि हिन्दू राष्ट्रके नेता सत्ताके लिए नहीं, राष्ट्र और हिन्दू धर्मके उत्थान हेतु प्रयत्नशील होंगे !
कोई भी व्यक्ति, महापुरुष अपने पुरुषार्थसे बनता है अर्थात अपनी कर्मठतासे बनता है, ऐसे महापुरुषोंके जन्म तिथि एवं मृत्यु तिथिपर अवकाश देना, उनकी कर्मठताका अपमान करने समान है ! हिन्दू राष्ट्रमें ऐसी तिथियोंपर सार्वजानिक अवकाश नहीं होगा…