ब्राह्मणस्य तु देहोऽयं न कामार्थाय जायते । इह क्लेशाय तपसे प्रेत्य त्वनुपमं सुखम् ।। – महाभारत (१२.३२९.२२) […]
राजधर्मके सिद्धान्त बतानेवाले हमारे अनेक धर्मग्रन्थोंमें दिए हुए दृष्टिकोणका आजके राज्यकर्ताओंने अभ्यास कर, योग्य कृति करनी चाहिए । जैसे मनुस्मृतिके अनुसार यथोद्धरति निर्दाता कक्षं धान्यं च रक्षति । तथा रक्षेन्नृपोराष्ट्रं हन्याच्च परिपन्थिनः ।। – मनुस्मृति ७:११० अर्थ : जिस प्रकार खेती करनेवाला किसान धान्यकी रक्षा हेतु खर-पतवारको उखाड फेंकता है, उसी प्रकार राजाको राष्ट्रकी […]
नाभिषेको न संस्कार: सिंहस्य क्रियते मृगैः ।विक्रमार्जितराज्यस्य स्वयमेव मृगेंद्रता ।। अर्थ : पशु जगत, सिंहको अपना राजा, राज्याभिषेकका उत्सव मनाकर कर घोषित नहीं करता । सिंह अपना राज्य अपने पराक्रमसे अर्जित करता है !
आयुष: क्षण एकोपि सर्वरत्नैर्न लभ्यते । नीयते तद् वृथा येन प्रामाद: सुमहानहो ।। अर्थ : सब रत्न देनेपर भी जीवनका एक क्षण भी वापिस नहीं मिलता । ऐसे जीवनके क्षण जो निरर्थक ही व्यय कर रहे हैं, वे कितनी बडी चूक कर रहे है ।
परित्यज्येयं त्रैलोक्यं राज्यं देवेषु वा पुनः। यद्धाप्याधिकमेताभ्यां न तु सत्यं कथंचन।। – महाभारत, आदिपर्वः (१०३: १५) अर्थ : “मैं तीनों लोकों का राज्य, देवताओंका साम्राज्य अथवा इन दोनोंसे भी अधिक महत्त्वकी वस्तुको भी पूर्णत: त्याग सकता हूं, परन्तु सत्यको किसी प्रकार नहीं छोड सकता।”
आजकी पीढीको चरित्र रक्षणके विषयमें बाल्यकालसे ही संस्कारित नहीं किया गया; फलस्वरूप आजकी युवा पीढीका चारित्रिक पतन इस देशके सामाजिक शास्त्रियोंके लिए चिन्ताका विषय बन चुका है । शास्त्र कहता है – यथा हि मलिनै: वस्त्रै: यत्र कुत्र उपविष्यते । वॄतत: चलितोपि एवं शेषं वॄतं न रक्षति ।। अर्थात जिसप्रकार मैले वस्त्रवाले कहीं भी बैठ जाते […]
रोहते सायकैर्विद्धं वनं परशुना हतम् , वाचा दुरुक्तं भीभत्सं न सम्रोहति वाक्क्षतम् – महाभारत, उद्योगपर्व अर्थ : धनुषद्वारा किये गए आघातके घाव भर सकते हैं, कुल्हाडीसे काटी गयी जंगल पुनः पल्लवित हो सकती है; परंतु शब्द-बाणद्वारा किया गया कटाक्षको भूलना संभवतः कठिन है।
धर्मार्थो य : परित्यज्य स्यादिन्द्रियवशान्गनुग: । श्री प्राण धन दारेभ्य: क्षिप्रः स परिहीयते।। – विदुर नीति अर्थ : जो मनुष्य धर्म और धर्म अनुकूल अर्थको छोडकर – उनका ध्यान न रखकर – इंद्रियोंकी इच्छाका अनुगामी हो जाता है, वह शीघ्र ही यश, धन, स्त्री आदि बांधव एवं जीवनसे सर्वथा रहित हो जाता है ! भावार्थ […]
यस्य प्रसादादहमेव सर्वं मय्येव सर्वं परिकल्पितं च । इत्थं विजानामि सदात्मरूपं तस्यांघ्रिपद्मं प्रणतोऽस्मि नित्यम् ।। अर्थ : जिनकी कृपासे यह ज्ञान होता है कि हम ही सबमें हैं और सब हममें समाहित हैं; ऐसे आत्मज्ञानी श्रीगुरुके श्रीचरणोंमें नित्य नमन और पूजन करता हूं।
सत्यं माता पिता ज्ञानं धर्मो भ्राता दया सखा। शान्ति: पत्नी क्षमा पुत्र: षडेते मम बान्धवा: ।। अर्थ : सत्य मेरी माता है, ज्ञान मेरे पिता हैं, धर्म मेरे भ्राता हैं और दया मेरा सखा हैं । शांति मेरी पत्नी है और क्षमा मेरा पुत्र है, यह छह मेरे बांधव (संबंधी) हैं।