यस्मिन यथ वर्तते यो मनुष्यस्तस्मिस्तथा वर्तित्व्यं स धर्मेः। मायाचारी मायया वर्तितव्यः साध्वाचारः साधुना प्रत्युपेयः।। – विदुर नीति अर्थ : जो अपेक्षा हमें दूसरोंके वर्तनसे होता है, वैसा ही हमें भी करना चाहिए, यही धर्म है। यदि कोई कपटसे वर्तन करे तो उसका प्रत्युत्तर भी उसी प्रकार देना चाहिए । जिसका व्यवहार अच्छा हो उसे सम्मान […]
चन्दनं शीतलं लोके चन्दनादपि चन्द्रमाः । चन्द्रचन्दनयोर्मध्ये शीतला साधुसंगतः ॥ अर्थ : चन्दन शीतलता प्रदान करता है; किन्तु उससे भी अधिक शीतल चन्द्रमा है | चन्द्र और चन्दनसे भी शीतल साधु-पुरुषका संगत है |
तमसो लक्षणं कामो रजसत्त्वर्थ उच्यते | सत्त्वस्य लक्षणम् धर्मः श्रैष्ठ्यमेषां यथोत्तरम् || – मनुस्मृति अर्थ : कामवासनाको तमोगुणका, अर्थको रजोगुणका तथा धर्माचरणको सत्त्व गुण का लक्षण कहा गया है | तमोगुणकी अपेक्षा रजोगुण एवं रजोगुणकी अपेक्षा सत्त्वगुण उत्तम(सूक्ष्म) है |
दश धर्मं न जानन्ति धृतराष्ट्र निबोध तान् । मत्त: प्रमत्त: उन्मत्त: श्रांत: क्रुद्धो बुभुक्षित: ।। त्वरमाणश्च लुब्द्धश्च भीत: कामी च ते दश । तस्मादेतेषु सर्वेषु न प्रसज्जेत पंडित : ।। – विदुर नीति अर्थ : हे धृतराष्ट्र ! दस प्रकारके व्यक्ति धर्मको नहीं जानते। उन्हें तुम सुनो । वह इस प्रकार है – मद्यपानमें मत्त, विषयासक्त मनवाला प्रमत्त, उन्माद आदि युक्त […]
प्रावाद: सत्यम् एव अयं त्वां प्राति प्रायशो नॄप । पतिव्रतानां न अकस्मात् पतन्ति अश्रूणि भूतले ।। अर्थ : अपने पति, राजा रावणके मृत देहको देखकर, मंदोदरीने कहा “जब किसी पतिव्रता स्त्रीके आंसू जब भूमिपर गिरता है तो वह व्यर्थ नहीं जाता और यह आपके साथ पुनः सिद्ध हो गया है”। (सीता माता एक पतिव्रता नारी थीं और […]
यं त्वार्याः क्रियमाणं प्रशंसन्ति स धर्मो यं गर्हन्ते सोsधर्मः । – (आपस्तम्ब धर्म सूत्र १:७ :९) अर्थ : सत्पुरुष जिस आचारका स्वयं पालन करते हुए प्रशंसा करते हैं, उसका अनुमोदन करनेका परामर्श देते हैं, वह धर्म है और जिस आचारकी निन्दा करते हैं तथा स्वयं भी उसका आचरण नहीं करते वह अधर्म है । भावार्थ […]
वध्यन्ते न ह्यविश्वस्ता: शत्रुभिदुर्बला अपि । विश्वस्तास्तेषु वध्यन्ते बलवन्तोऽपि दुर्बलै: ॥ – महाभारत १२.१३८.१९८ अर्थ : जो सावधान होते हैं, वे दुर्बल होते हुए भी शत्रुके हाथों नहीं मारे जाते हैं; किन्तु जो बलाढ्य(शक्तिशाली ) होते हैं; वे यदि शत्रुके विषयमें असवाधान रहते हैं तो भी दुर्बल शत्रुद्वारा मारे जाते हैं।
महता पुण्ययोगेन मानुषं जन्म लभ्यते । तत्प्राप्य न कृतो धर्मः कीदृशं हि मयाकृतम् ॥ – गरुड पुराण अर्थ : अत्यधिक पुण्यसे मनुष्यका यह जन्म प्राप्त होता है। यह प्राप्त करनेपर भी मैंने धर्म अनुसार आचरण नहीं किया यह ज्ञान होनेपर वह व्यक्ति दुखी होता है कि मात्र शरीर छोडनेसे वह जन्म-मृत्युके चक्रसे नहीं निकल सकता है। […]
दुर्लभम् त्रैमेवैतद्देवानुग्रहहेतुकं । मनुष्यत्वम् मुमुक्षत्वम् महापुरुषसंश्रय ।। – विवेकचूडामणि
आद्यगुरु शंकराचार्यके अनुसार तीन बातोंका एक साथ होना दुर्लभ है और यह मात्र देवकृपासे साध्य हो सकता है –
१. मनुष्यकी योनि
२. मुमुक्षुत्व
३. सन्तका सान्निध्य, मार्गदर्शन एवं कृपा मिलना………
स्वाध्याये नार्चयेतर्षीन्हो मैर्देवान्यथाविधि । पितृ श्राद्धैश्च नृनन्नैर्भूतानि बलिकर्मणा ।। – मनुस्मृति
अर्थ : स्वाध्याय तथा पूजासे ऋषियोंका सत्कार, शास्त्र अनुसार यज्ञ कर देवताओंकी पूजा, श्राद्धोंसे पितरोंकी पूजा, अन्न देकर अतिथियोंकी और बलिकर्मसे सम्पूर्ण भूतोंकी पूजा (संतुष्टि) करनी चाहिए…………