भायँ कुभायँ अनख आलस हूँ। नाम जपत मंगल दिसि दसहूँ॥
सुमिरि सो नाम राम गुन गाथा। करउँ नाइ रघुनाथहि माथा॥1॥ – रामचरितमानस
अर्थ :-अच्छे भावसे (प्रेमसे) , बुरे भावसे (बैरसे ) , क्रोधसे या आलस्य से, किसी प्रकारसे भी नाम जपनेसे दसों दिशाओंमें कल्याण होता है……
धर्ममूलं श्रियं प्राप्य न जहाति न हीयते ।
अर्थ : धर्मके मार्गका अनुसरण कर, अर्जित किया गया धन न कभी घटता है न ही उसका नाश होता है !
आपदि मित्र परीक्षा शूरपरीक्षा च रणाङ्गणे । विनये वम्श परीक्षा च शील परीक्षा तु धनक्षये ।।
अर्थ : मित्रकी परीक्षा विपत्तिके समय होती है , वीरकी परीक्षा युद्धक्षेत्रमें होती है , कुलीनताकी परीक्षा लीनतासे होती है और चरित्रकी परीक्षा दरिद्रतामें हो जाती है !
साधु चरित सुभ चरित कपासू। निरस बिसद गुनमय फल जासू॥
जो सहि दुख परछिद्र दुरावा। बंदनीय जेहिं जग जस पावा॥ – बालकांड, रामचरितमानस
अर्थ : संतोंका चरित्र कपासके चरित्र (जीवन) के समान शुभ है, जिसका फल नीरस, विशद और गुणमय होता है जिस कारण वे वंदनीय और यशस्वी होते हैं ।
हरिः सर्वेषु भूतेषु भगवानास्त ईश्वरः । इति भूतानि मनसा कामैस्तै: साधु मानयेत् ॥ – श्रीमद्भागवतपुराणम् (७:७:३२)
अर्थ : समस्त भूत-प्राणियोंमें सर्वेश्वर भगवान श्रीहरि विराजमान हैं, यों अपने मनमें समझते हुए उन सबको इच्छानुसार वस्तुएं….
हरो यद्युप्देष्टा ते हरि: कमलजोsपि । तथापि न तव स्वास्थ्यम् सर्वविस्मरणादृते ।। – अष्टावक्र गीता
अर्थ : चाहे साक्षात भगवान शिव, कृष्ण या कमलसे जन्मे ब्रह्मा हमारे उपदेशक हों जब तक हम भूतकालके सर्व संस्कारोंका विस्मरण नहीं करते तब तक हम आत्मतत्त्वमें स्थित नहीं हो सकते हैं ।
शत्रुश्चैव हि मित्रं च न लेख्यं न च मातृका । यो वै संतापयति यं स शत्रु: प्रोच्यते नृप ॥ – महाभारत २.५५.१०
अर्थ : हे राजन, यह हमारा शत्रु है और यह हमारा मित्र है यह किसीके ऊपर कहीं चिन्हित या अक्षरसे अंकित नहीं होता……
शान्ति तुल्यं तपो नास्ति न सन्तोषात्परं सुखम् । न तृष्णायाः परो व्याधिर्न च धर्मो दयापरः ।। – चाणक्य नीति
अर्थ : शांति समान कोई तप नहीं होता संतोष समान कोई सुख नहीं होता। तृष्णा (लोभ ) समान कोई व्याधि नही……
दुर्बलस्य बलं राजा बालानां रोदनं बलम् । बलं मूर्खस्य मौनित्वं चौराणामनृतं बलम् ॥ – चाणक्य नीति
अर्थ : दुर्बलोंका बल राजा है; बच्चोंका बल रुदन है; मूर्खोका बल मौन है….