त्रिदण्डमेतन्निक्षिप्य सर्व भूतेषु मानव: । काम क्रोधो तु संयम्य ततः सिद्धिं नियच्छति ।। – मनुस्मृति
अर्थ : यदि मनुष्य सभी जीवोंपर तीनों – मन , शरीर और वाणीके माध्यमसे दंडोंका पालन करता है….
जलान्तश्चन्द्रचपलं जीवनं खलु देहिनाम् । तथाविधिमिति त्वाशाश्वत्कल्याणमाचरेत् ।।
अर्थ : जिस प्रकार चन्द्रका प्रतिबिंब अस्थिर होता है उसी प्रकार मनुष्यका जीवन भी अनिश्चित और अस्थिर होता है…..
चला लक्ष्मीश्चलाः प्राणाश्चलं जीवित-यौवनम् । चलाचले च संसारे धर्म एको हि निश्चलः ।। – चाणक्य नीति
अर्थ : लक्ष्मी चंचला अर्थात अस्थिर है , जीवन-प्राण अस्थिर हैं, जीवन व यौवन अस्थायी हैं…..
सुखं न विना धर्मात् तस्मात् धर्मपरो भवेत् । – वाग्भटकृत अष्टांगहृदय, सूत्रस्थान २:१९
अर्थ : बिना धर्मपालनके सुखकी प्राप्ति संभव नहीं, अतः धर्माचरणी होना चाहिए…..
माता मित्रं पिता चेति स्वभावात् त्रतयं हितम् । कार्यकारणतश्चान्ये भवन्ति हितबुद्धयः ॥
अर्थ : माता, पिता एवं मित्र ये स्वभावसे ही हमारे हितचिंतक होते हैं । शेष कोई यदि हमारा भला करता है……
पेलवं शरदीवाभ्रमस्नेह एव दीपक:। तरंगक इवालोलं गतमेवोपलक्ष्यते ।। – श्री वशिष्ठदर्शनं (१-१४-६)
अर्थ : जीवन शरद ऋतुके बादल समान भ्रमित करनेवाले एवं क्षणिक होता है । यह बिना तेलके दीपक समान होता है…
यदि देहं पृथक्कृत्य चिति विश्रामस्य तिष्ठसि । अधुनैव सुखी शान्त: बन्धु मुक्तो भविष्यसि ।। – अष्टावक्र गीता (१: ४)
अर्थ : यदि तुम अपने आपको देहसे अनासक्त कर दोगे और चित्तमें स्थिर कर दोगे तब उसी क्षण तुम सुखी शांत और बंधनमुक्त हो जाओगे !
चरितव्यमतो नित्यं प्रायश्चित्तं विशुद्धये । निन्द्यर्हि लक्षनैर्युक्ता जायन्तेs निष्कृतैनसः ।। – मनुस्मृति
अर्थ : जो पापी लोग प्रायश्चित नहीं करते वे परिणामस्वरूप अगले जन्ममें निंदनीय लक्षणोंसे युक्त होकर जन्म लेते हैं….
बंधु प्रियवियोगांश्च संवासं चैव दुर्जनै : । द्रव्यार्जनं च नाशं च मित्रामित्रस्य चार्जनम् ।।
जरां चैवाप्रतिकारां व्याधिभिश्चोपीडनम् । क्लेशान्श्च विविधांस्तांस्तान्मृत्युमेव च दुर्जयम् ।। – मनुस्मृति
अर्थ : पाप कर्म करनेवालेको जीवनमें अपने प्रियजनोंका विरह, बुरी संगति, धनार्जनमें बाधाएं, अर्जित धनका समाप्त होना, मित्रोंकी हानि एवं शत्रुओंकी संख्या अधिक होना आदि कष्टोंको भोगना पडता है……
द्विविधो वसनाव्यूहः शुभश्चैवाशुभश्च ते । वासनौघेन शुद्धेन तत्र चेदपनीयसे ।।
तत्क्रमेण शुभेनैव पदं प्राप्यस्यसि शाश्वतम। अथ चेदशुभो भावो यत्नात् जेतव्य एव सः ।। – योगवशिष्ठ (२: ४,५)
अर्थ : वासना दो प्रकारके होते हैं, पवित्र और अपवित्र । यदि पवित्र वासनाके प्रवाहमें रहें तो शाश्वत सत्यकी प्राप्ति होगी…