शास्त्र वचन

सिद्धियां किसे प्राप्त होती हैं ?


त्रिदण्डमेतन्निक्षिप्य सर्व भूतेषु मानव: । काम क्रोधो तु संयम्य ततः सिद्धिं नियच्छति ।। – मनुस्मृति                                       
अर्थ : यदि मनुष्य सभी जीवोंपर तीनों – मन , शरीर और वाणीके माध्यमसे दंडोंका पालन करता है….

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क्षणभंगुर मनुष्य जीवनका कैसे करें कल्याण ?


जलान्तश्चन्द्रचपलं जीवनं खलु देहिनाम् । तथाविधिमिति त्वाशाश्वत्कल्याणमाचरेत् ।। 

अर्थ : जिस प्रकार चन्द्रका प्रतिबिंब अस्थिर होता है उसी प्रकार मनुष्यका जीवन भी अनिश्चित और अस्थिर होता है…..

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मात्र धर्मका स्थिर होना


चला लक्ष्मीश्चलाः प्राणाश्चलं जीवित-यौवनम् ।  चलाचले च संसारे धर्म एको हि निश्चलः ।। – चाणक्य नीति                        
अर्थ : लक्ष्मी चंचला अर्थात अस्थिर है , जीवन-प्राण अस्थिर हैं, जीवन व यौवन अस्थायी हैं…..

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धर्माचरणी होना चाहिए


सुखं न विना धर्मात् तस्मात् धर्मपरो भवेत् । – वाग्भटकृत अष्टांगहृदय, सूत्रस्थान २:१९ 

अर्थ : बिना धर्मपालनके सुखकी प्राप्ति संभव नहीं, अतः धर्माचरणी होना चाहिए…..

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हमारे खरे हितचिंतक कौन ?


माता मित्रं पिता चेति स्वभावात् त्रतयं हितम् । कार्यकारणतश्चान्ये भवन्ति हितबुद्धयः ॥                                                      
अर्थ : माता, पिता एवं मित्र ये स्वभावसे ही हमारे हितचिंतक होते हैं । शेष कोई यदि हमारा भला करता है……

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क्षणभंगुर जीवन


पेलवं शरदीवाभ्रमस्नेह एव दीपक:। तरंगक इवालोलं गतमेवोपलक्ष्यते ।। – श्री वशिष्ठदर्शनं (१-१४-६)                                 
अर्थ : जीवन शरद ऋतुके बादल समान भ्रमित करनेवाले एवं क्षणिक होता है । यह बिना तेलके दीपक समान होता है…

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मनुष्य बन्धनमुक्त कब होता है ?


यदि देहं पृथक्कृत्य चिति विश्रामस्य तिष्ठसि । अधुनैव सुखी शान्त: बन्धु मुक्तो भविष्यसि ।। – अष्टावक्र गीता (१: ४)        
अर्थ : यदि तुम अपने आपको देहसे अनासक्त कर दोगे और चित्तमें स्थिर कर दोगे  तब उसी क्षण तुम सुखी शांत और बंधनमुक्त हो जाओगे !

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अपनी शुद्धिके लिए नित्य प्रायश्चित्त करे


चरितव्यमतो नित्यं प्रायश्चित्तं विशुद्धये ।  निन्द्यर्हि लक्षनैर्युक्ता जायन्तेs निष्कृतैनसः ।। – मनुस्मृति                                           
अर्थ : जो पापी लोग प्रायश्चित नहीं करते वे परिणामस्वरूप अगले जन्ममें निंदनीय लक्षणोंसे युक्त होकर जन्म लेते हैं….

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कर्म फल न्यायके सिद्धांत अनुसार पापीको होनेवाले कष्ट


बंधु प्रियवियोगांश्च संवासं चैव दुर्जनै : । द्रव्यार्जनं च नाशं च मित्रामित्रस्य चार्जनम् ।।
जरां चैवाप्रतिकारां व्याधिभिश्चोपीडनम् । क्लेशान्श्च विविधांस्तांस्तान्मृत्युमेव च दुर्जयम् ।। –  मनुस्मृति                                
अर्थ : पाप कर्म करनेवालेको जीवनमें अपने प्रियजनोंका विरह, बुरी संगति, धनार्जनमें बाधाएं, अर्जित धनका समाप्त होना, मित्रोंकी हानि एवं शत्रुओंकी संख्या अधिक होना आदि कष्टोंको भोगना पडता है……

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अपवित्र वासनाको करें, क्रियमाणसे नियन्त्रित


द्विविधो वसनाव्यूहः शुभश्चैवाशुभश्च ते  वासनौघेन शुद्धेन तत्र चेदपनीयसे 

तत्क्रमेण शुभेनैव पदं प्राप्यस्यसि शाश्वतम। अथ चेदशुभो भावो यत्नात् जेतव्य एव सः । –   योगवशिष्ठ (२: ४,५)

अर्थ : वासना दो प्रकारके होते हैं, पवित्र और अपवित्र । यदि पवित्र वासनाके प्रवाहमें रहें तो शाश्वत सत्यकी प्राप्ति होगी…

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