शास्त्र वचन

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निशानां च दिनानां च यथा ज्योतिः विभूषणम् । सतीनां च यतीनां च तथा शीलमखण्डितम् ॥ अर्थ : जैसे प्रकाश, दिन और रातका भूषण है, वैसे ही अखण्डित शील, सतियों और यतियोंका भूषण है ।

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व्रजन्ति ते मूठधियः पराभवम् । भवन्ति मायाविषु ये न मायिनः ॥  अर्थ : जो राजा कपटी व्यक्तिके साथ कपटी वर्तन नहीं करता है, उस मूर्ख राजाका पराभव होता है ।

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अतो विमुक्त्यै प्रयतेत विद्वान् संन्यस्तबाह्यर्थसुखस्पृह: सन् । सन्त महान्त समुपेत्य देशिकं तेनाप्दिष्टार्थसमहितात्मा ।। – विवेकचूडामणि अर्थ : विद्वान पुरुषोंको सम्पूर्ण बाह्य भोगोंकी इच्छा त्यागकर सन्त शिरोमणि गुरुदेवके शरणमें जाकर उनके उपदेश किए हुए विषयोंको आत्मसातकर मुक्ति हेतु प्रयत्न करने चाहिए ।

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कृते शुक्लश्चतुर्बाहू: जटिलो वल्कलाम्बर: ।  कृष्णाजिनोपवीताक्षान बिभद दण्डकमण्डलु ।।   अर्थ : सत्ययुगमें भगवानका श्वेत वर्ण होता है, वे चार भुजाएं, सिरपर जटा, वल्कल वस्त्र, काले मृगका चर्म, यज्ञोपवीत, रुद्राक्षकी माला, दण्ड और कमण्डलु धारण करते हैं । ———- त्रेतायां रक्तवर्णोंsसौ चतुर्बाहुस्त्रिमेखल: ।  हिरण्यकेश: त्रय्यात्मास्त्रुक स्त्रुवादि उपलक्षण: ।।  अर्थ : त्रेतायुगमें उन भगवानका रंग लाल होता […]

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द्वविमौ ग्रसते भूमिः सर्पो बिलशयानिवं  राजानं चाविरोद्धारं ब्राह्मणं चाप्रवासिनम् अर्थ : जिस प्रकार बिलमें रहनेवाले मेंढक, चूहे आदि जीवको सर्प खा जाता है, उसी प्रकार शत्रुका विरोध न करनेवाला राजा और परदेश गमनसे डरनेवाले ब्राह्मणको यह समय खा जाता है ।

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मति कीरति गति भूति भलाई । जब जेहिं जतन जहां जेहिं पाई ॥ सो जानब सतसंग प्रभाऊ । लोकहुं बेद न आन उपाऊ ॥ अर्थ : उनमेंसे जिसने जिस समय जहां कहीं भी जिस किसीने, यत्नसे बुद्धि, कीर्ति, सद्गति, विभूति (ऐश्वर्य) और भलाई पाई है, सो सब सत्संगका ही प्रभाव समझना चाहिए । वेदोंमें और […]

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नाम: चिंतामणि कृष्णश्चैतन्य रस विग्रह: । पूर्ण शुद्धो नित्यमुक्तोSभिन्नत्वं नाम नामिनो: ॥ – पद्मपुराण अर्थ : हरिनाम उस चिन्तामणिके समान है जो समस्त कामनाओंको पूर्ण कर सकता है । हरिनाम स्वयं रसस्वरूप कृष्ण ही है तथा चैतन्यस्वरूप है । कृष्ण नाम पूर्ण है, शुद्ध है, नित्यमुक्त है । नामी (हरि) तथा नाममें कोई अन्तर नहीं […]

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प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये । बन्धं मोक्षं च या वत्ति बुद्धि: सा पार्थ सात्त्विकी ।। अर्थ : हे पार्थ ! जो बुद्धि प्रवृतिमार्ग और निवृतिमार्गको, कर्तव्य और अकर्तव्यको, भय और अभयको तथा बन्धन और मोक्षका यथार्थ जानती है, वह बुद्धि सात्त्विक होती है ।

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 वाणी रसवती यस्य, यस्य श्रमवती क्रिया । लक्ष्मी : दानवती यस्य, सफलं तस्य जीवितं ।। अर्थ : जिस मनुष्यकी वाणी मीठी है, जिसका कार्य परिश्रमसे युक्त है, जिसका धन दान करनेमें प्रयुक्त होता है, उसका जीवन सफल है ।

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सदैव पाप और पुण्यकर्म किनसे होते हैं ?


पापंप्रज्ञानाशयतिक्रियमाणंपुनःपुनः। नष्टप्रज्ञःपापमेवनित्यमारभतेनरः॥ – विदुर नीति अर्थ : बार-बार क्रियमाणद्वारा पाप करनेसे मनुष्यकी विवेक बुद्धि नष्ट हो जाती है और जिसकी विवेक बुद्धि नष्ट हो चुकी हो, ऐसे व्यक्तिसे सदैव पापकर्म होते हैं । पुण्यंप्रज्ञावर्धयतिक्रियमाणंपुन: पुन: । वॄद्धप्रज्ञ: पुण्यमेवनित्यमारभतेनर: ॥ – विदुर नीति अर्थ : बार-बार क्रियमाणद्वारा पुण्य करनेसे मनुष्यकी प्रज्ञा बढती है और जिसका विवेक […]

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