श्रीगुरु उवाच

रजप्रधान राजनीतिज्ञ नहीं, सत्त्वप्रधान भक्त ही हिन्दू राष्ट्र अर्थात रामराज्य स्थापित करेंगे !


साम्प्रदायिक भक्त, अपना सम्प्रदाय नहीं परिवर्तित करते हैं, उसीप्रकार किसी विशिष्ट देवताके भक्त, उपास्यदेवता नहीं परिवर्तित करते, अर्थात अन्य देवताकी उपासना करना आरम्भ नहीं करते हैं । ऐसी एकनिष्ठता राजनेताओंमें दिखाई नहीं देती, वे पक्ष परिवर्तित करते हैं; क्योंकि वे रजप्रधान एवं चंचल चित्तवाले होते हैं । इसके विपरीत साम्प्रदायिक साधक तथा भक्त सत्त्वप्रधान होते […]

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श्रीगुरु उवाच


अन्य पन्थियोंका शोषण न करनेवाला एकमात्र धर्म !  दूसरोंको जीतकर उनका शोषण करो, उनपर राज करो, ऐसा न सिखानेवाला धर्म है, हिन्दू धर्म !

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आजके विज्ञानसे भी परे है हिन्दू धर्म अन्तर्गत कर्मकाण्ड !


हिन्दू धर्मद्वारा प्रतिपादित जन्म और मृत्युके मध्य होनेवाली धार्मिक कृतियां जैसे विवाह, वास्तु शान्ति (एक ऐसी धार्मिक कृति जिसमें वास्तुकी शुद्धि हेतु आध्यात्मिक  उपाय सम्पन्न किए जाते हैं) एवं श्राद्ध-कर्म (ऐसी धार्मिक प्रक्रिया जो किसी व्यक्तिके मृत्युकी तिथिसे तेरहवें दिनतक की जाती है अथवा हिन्दू पंचांगद्वारा निर्दिष्ट पुण्यतिथिपर मृत पूर्वजोंके सूक्ष्म शरीरकी शान्ति हेतु किए […]

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आश्रममें एक कक्षमें अनेक साधकोंके साथ रहनेके लाभ


आश्रममें कक्षके आकारके अनुसार एक कक्षमें ३ से ७ साधक रहते हैं । एकत्रित रहनेवालोंको आगे दिए गए लाभ होते हैं । १. अन्योंके साथ परिवारके समान निकटता साध्य होना । २. आपसमें एक दूसरेके दोषों एवं गुणोंका भान होनेसे स्वभावदोष नष्ट करने हेतु दूसरोंकी सहायता करना तथा दूसरोंके गुण स्वयं आत्मसात करना ३. देहबुद्धि […]

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हिन्दू राष्ट्रप्रेमियो, तात्कालिक कार्योंमें समय व्यर्थ न करें !


हिन्दू राष्ट्रप्रेमियो, तात्कालिक कार्योंमें समय व्यर्थ करनेके स्थानपर सर्व प्रयत्न हिन्दू राष्ट्रकी स्थापनाका अन्तिम ध्येय साध्य करने हेतु करें ! पुलिस किसी स्थानके निर्देश सम्बन्धित अनुमतिको निरस्त करे तो हठ करते हुए, प्रदर्शन कर, वहां पुलिसद्वारा किए ‘लाठीचार्ज’में लाठी खाना, पकडे जाकर कारागृहमें जाना एवं आगे कई बार पुलिसद्वारा पूछताछ हेतु बुलाए जाने, न्यायालयमें जाने […]

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पुलिस अपराधियोंसे अधिक पापी !


 किसीने अपराध किया, तो उसे पाप लगता है । उस अपराधकी जांचके लिए जो पुलिस अनेक निरपराधियोंको प्रताडित करती है, उन्हें अनेक गुना अधिक पाप लगता है ।

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हिन्दू धर्मकी एकमेवाद्वितीयता


जैसे कुछ पन्थोंमें करते हैं, वैसे हिन्दू धर्ममें धर्मप्रसार कर केवल स्वयंके धर्म व अनुयायियोंकी संख्या बढानेका महत्त्व नहीं है; अपितु हिन्दू धर्ममें धर्मकी गहनता और सूक्ष्मतामें जानेका महत्त्व है । इसका अर्थ है, ‘हिन्दू धर्ममें हिन्दू धर्मके शाश्‍वत मूल्य व सिद्धान्त समझकर तदनुसार आचरण कर धर्मकी अनुभूति, अर्थात साक्षात ईश्‍वरकी अनुभूति लेनेका महत्त्व है […]

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श्रीगुरु उवाच


हिन्दू राष्ट्रमें सभी साधना करनेवाले होंगे; अतः साधनासे दूर ले जानेवाला ‘बुद्धिप्रामाण्यवाद’, इसे एक अपशब्द (गाली) समझा जाएगा ।

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श्रीगुरु उवाच


हिंदुओ, कोई भी राजकीय पक्षका शासन (सरकार) आपलोगोंको शाश्वत रूपसे संकटमुक्त, नीतिमान, आनन्ददायी तथा सर्व दृष्टिसे आदर्श राज्य नहीं दे पाएगी । अब आपलोग ही संगठित होकर समर्थ हों तथा ऐसे हिन्दू राष्ट्रकी स्थापना करें !

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भारतमें प्रजातन्त्रके असफल होनेके कारण  


स्वार्थी समाज प्रजातन्त्रके योग्य नहीं होता । जो राष्ट्र और समाजके बारेमें विचार करते हैं, प्रजातन्त्र उनके लिए ही उपयोगी होता है । – परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले, संस्थापक सनातन संस्था साभार : मराठी दैनिक सनातन प्रभात

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