क्रांति यशस्वी होने हेतु प्रखर राष्ट्राभिमानके साथ ही साधनाका बल होना आवश्यक है ! साधनाका बल और समर्थ रामदास स्वामीके मार्गदर्शन होनेके कारण छत्रपति शिवाजी महाराज हिन्दू धर्मराज्यकी स्थापना करनेमें सफल हुए । अनेक क्रांतिकारी प्रखर राष्ट्रवादी होनेपर भी साधनाका बल न होनेके कारण वे यशस्वी नहीं हो पाए और उन्होंने अपने प्राण भी गवाएं […]
जब अभिलाषा एवं प्राणिमात्र की सहज प्रवृत्तियां, रुचि एवं अरुचि तथा स्वभाव संबंधी विशिष्टताएं आदि तीव्र संस्कार अवचेतन मस्तिष्कसे धुल जाते हैं, केवल तभी अज्ञानता नष्ट होकर चिरस्थायी आनंदका अनुभव किया जा सकता है । तीव्र संस्कार एवं अज्ञानता नष्ट करनेकी यह विधि आध्यात्मिक अभ्यास कहलाती है । -परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले
पूजा करते समय होने वाली अयोग्य कृति : निम्न अयोग्य कृति यदा-कदा घटित होती दिखाई देती है – अ : देवताकी मूर्ति सिर पकडकर उठाई जाती है तथा हाथमें लटकाई जाती है । आ : देवता /संत अथवा सदगुरुका छायाचित्र किसी भी प्रकार पोछा जाता है । इ : गंध, कंकु किसी भी प्रकार लगा […]
भोजन करते समय भोजनपर ध्यान रहनेके कारण, भोजन कैसा है, भोजनमें मेरे रूचिका व्यंजन है या नहीं, इस प्रकारके विचार मनमें आते हैं और वृत्ति बहिर्मुख रहती है। भोजनमें यदि कोई व्यंजन अच्छा न हो तो उसके कारण भोजन करते समय मनमें नकारात्मक विचार आते हैं, कभी-कभी वह व्यक्त हो जाता है जिस कारण दुसरेके […]
शहरमें रहनेवाले लोग मायाके अधीन जीवन जीते हैं । अधिकतर इस माया चक्रमें ईश्वरको भूल जाते हैं । अनेक सुख-सुविधाओंके होनेके कारण उनके शरीरको कार्य करनेकी प्रवृत्ति नहीं रहती । उसी तरह प्रलोभन एवं स्वार्थके कारण उनकी वृत्ति संकुचित एवं प्रेमभाव रहित हो जाती है । इससे उनके मनकी निर्मलता एवं आनंदका लोप होकर उनका […]
निम्नलिखित सुवचनसे सम्बंधित घटनाका संक्षिप्त विवरण सर्वप्रथम देती हूं । शिवाजी महाराजकी सेनामें तानाजी मालुसरे नामक वीर सेनापति थे । उन्हें उनके पुत्र रायबाके विवाह अवसरपर कोंडाणा दुर्ग (किला) जीतनेका आदेश मिला था । उनके उद्गार थे, “पहले विवाह कोन्डानेकी, तत्पश्चात् रायबाकी !” इस किलेको जीतते हुए वे वीरगतिको प्राप्त हुए थे । शिवाजी महाराजने […]
यदि कभी अच्छा ध्यान लगता है तो मन करता है कि कभी भी उससे बाहर न आएं ! उसी प्रकार गोपियोंको लगता है कि वे कृष्णभावसे कभी बाहर न आएं ! – परात्पर गुरु डॉ. जयन्त आठवले
तथाकथित बुद्धिप्रामाण्यवादियोंको विज्ञानमें नये शोध करनेकी अनुमति है; परन्तु अध्यात्ममें नये शोधकी अनुमति नहीं ! सत्य, त्रेता एवं द्वापर युगोंमें अल्प शब्दोंमें ही तथ्योंका बताना पर्याप्त था; क्योंकि तबके मानवकी बुद्धि कलियुगीन मानवकी बुद्धिसे श्रेष्ठ थी एवं मानवोंमें श्रद्धा थी । कलियुगमें बौद्धिक क्षमता एवं श्रद्धा अल्प होनेसे अध्यात्म सविस्तार समझाना पडता है; परन्तु उसीपर […]
कुछ व्यक्ति वृक्ष, पक्षी और पशु क्या बोलते हैं यह मात्र समझ ही नहीं सकते तथापि निर्जीव वस्तु भी क्या बोलते है यह भी समझ सकते हैं । सम्पूर्ण जीवन ऐसे व्यक्ति ऐसे कृतियोंमें व्यस्त रहते हैं। यह एक प्रकारकी सिद्धि होती है। आत्मसाक्षात्कारकी अपेक्षा, मायाके संबंधमें ऐसे स्थूल विषयोंके बारे जानना व्यर्थ है और मायाके […]
मुस्लिम और ईसाई अपने-अपने इस्लाम और ईसाई धर्मकी महत्व समझते हैं । इसीलिये वे अनेक शतकोंसे सम्पूर्ण जगतके इस्लामीकरण एवं ईसाईकरणके लिये अथक प्रयास कर रहे हैं । जो हिन्दु स्वयंको बुद्धिमान,पाश्चात्य , बुद्धिवादी और सुधारक मानते हैं, उन्होंने हिन्दु धर्मका अभ्यास नहीं किया होता है और साधना भी की नहीं है; इसलिए उन्हें हिन्दू […]