‘बहुसंख्य हिंदू संस्कृतिहीन, धर्माभिमानशून्य एवं मृतवत हैं; ऐसेमें वे हिंदू राष्ट्र कैसे स्थापित कर सकेंगे ?’, इसका उत्तर है – ईश्वर एक भक्तके लिए भी दौडे चले आते हैं । हिंदू राष्ट्र हेतु प्रयासरत कुछ सहस्र भक्तोंके लिए तो वे निश्चित ही आएंगे । लोगोंको ऐसी चिंता होती है कि बंदूकें, पिस्तौल, बम, हवाई जहाज […]
हिंदुओंका ऐसा सोचना कि बिना आध्यात्मिक बल हम कुछ भी कर सकते हैं, यह अज्ञानता और अहंके लक्षण हैं | अतः इस प्रकारका अयोग्य दृष्टिकोण न रखें और आध्यात्मिक क्षमता बढाने हेतु साधना करें ! – परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले
विजयादशमी हिंदुओंके धर्मविजयका ही दिन है । इसी दिन श्री दुर्गादेवी एवं प्रभु श्रीरामने क्रमशः महिषासुर एवं रावण नामक दो असुरोंका वध कर, आसुरी (अधर्मी) शक्तियोंका निर्मूलन किया । इसी दिन बृहन्नलाके वेशमें अर्जुनने विराट राजाके पुत्रको सारथी बनाकर शमीके वृक्षके कोटरसे शस्त्र निकालकर, अपनी विजिगीषा (विजयप्राप्तिकी इच्छा)का परिचय दिया था । उन्होंने कौरवोंको पराजित […]
ज्ञानयोगकी तीव्र जिज्ञासा भक्तियोगकी तडपके समान होती है । कर्मयोगानुसार, ज्ञानयोगकी जिज्ञासाका कर्मफल प्राप्त होता है, अर्थात् उसे ज्ञान मिलता है, तो भक्तियोगमें भक्तकी तडपसे उसे ईश्वरप्राप्ति होती है । – परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले
व्यक्तिस्वातंत्र्य अर्थात् स्वैराचार (अर्थात् स्वेच्छा) । इसके विपरीत स्वेच्छा नष्टकर परेच्छासे तथा आगे ईश्वरेच्छासे वर्तनकर मायाके बन्धनसे मुक्त होकर वास्तविक स्वतंत्रताका उपभोग होता है ।- परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले
जिसप्रकार शिवपिण्डीपर जलधारा सतत गिरती रहती है, उसीप्रकार साधकका सतत अनुसन्धान होना चाहिए । – परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले (२९.४.२०१५)
धन साध्य नहीं; अपितु साधन है ! धन साध्य नहीं, इसका अर्थ है धन प्राप्त होना, यह साध्य अर्थात् ध्येय नहीं; अपितु साधन है । धन, त्यागरूपी साधना करनेका अवसर देनेका एक माध्यम है । – परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले
आधुनिक औषधियोंकी तुलनामें आयुर्वेदीय औषधियां अधिक प्रभावी होनेका कारण आधुनिक औषधियां पृथ्वी, आप और तेज, केवल इन तीन तत्त्वोंके स्तरपर होती हैं; इसलिए उनकी क्षमता अत्यल्प होती है । जबकि आयुर्वेदीय औषधियां बनाते समय मन्त्रोच्चारण किए जानेसे इन औषधियोंमें उपर्युक्त ३ तत्त्वोंके साथ वायु और आकाश तत्त्व भी सम्मिलित होनेके साथ-साथ ये कालानुसार भी होती […]
देखनेसे सुनना अधिक महत्त्वपूर्ण देखना, तेज तत्त्वके स्तरपर होता है तो सुनना, आकाश तत्त्वके स्तरपर । किसी भी सुन्दर कलाकृति या व्यक्तिकी ओर अधिक समय तक देखना सम्भव नहीं होता इसका एक और कारण है कि विषय वही रहता है; परन्तु आकाश तत्त्वमें विविध विषयोंपर वार्तालाप सम्भव है, इसी कारण चित्र अथवा मूक चित्रपटोंसे आकाशवाणी […]
विद्वानों समान अनर्गल बोलनेवाले आजके तथाकथित बुद्धिप्रामाण्यवादी ! गीता (अध्याय २, श्लो्क ११) भगवान श्रीकृष्णने अर्जुनसे कहा, प्रज्ञावादांश्च भाषसे । अर्थात् तुम विद्वानों समान (मूर्खोंसा) युक्तिवाद करते हो । आजके बुद्धिप्रामाण्यवादियोंकी बातें सुनकर इसका स्मरण होता है; क्योंकि वे किसी भी अभ्यास अथवा अनुभवके बिना किसी भी विषयपर अपना दृढ मत व्यक्त कर नहीं रुकते […]