१९८६ से २००६ तकके इस कालखंडमें मैंने अध्यात्मशास्त्रीय व्याख्यान, अभ्यासवर्ग और सार्वजनिक सभाओंको लेने हेतु अधिकसे अधिक समय भ्रमण किया | वर्ष २००७ से प्राणशक्ति अत्यल्प होनेके कारण मैं कहीं बाहर नहीं जा सका | पहले मुझे लगा कि अब मैं बाहर नहीं जा पाऊंगा तो धर्म प्रसार कैसे कर पाऊंगा ? मैं बाहर नहीं […]
कहां अनेक पत्नियोंकी (बहुविवाहकी) अनुमति देनेवाले अन्य धर्म तो कहां ब्रह्मचर्य सिखानेवाला हिन्दू धर्म ! -परात्पर गुरु डॉ . जयंत आठवले (३०.३.२०१४)
जीवनका अर्थ है, कुछ वर्षोंके लिए साथ आना तथा तत्पश्चात सदैवके लिए दूर जाना ! १. पुत्र जन्म लेनेके पश्चात चाकरी (नौकरी) लगनेतक साथमें रहता है; परन्तु तत्पश्चात जिस स्थानपर उसकी चाकरी (नौकरी) हो, वहां चला जाता है । २. पुत्री जन्मके बाद विवाहतक साथ रहती है; तत्पश्चात ससुराल जाती है । ३. नौकरी करते […]
न्यायका शीघ्रतासे न मिलना भी एक प्रकारका अन्याय है । ऐसा ना हो इसलिए सरकार सहस्रों न्यायालय क्यों स्थापित नहीं करती ? वर्षानुवर्ष न्याय न देनेवाले शासनके उत्तरदायी व्यक्ति खरे अर्थोंमें अपराधी हैं ।- परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले (२८.७.२०१४)
घर-परिवारका त्याग करनेवालोंके सम्बन्धमें यह समझ लें ! साधनाके लिए कुटुंबका त्याग करनेपर अनेक व्यक्ति टीका करते हैं कि उसे घरके सदस्योंके प्रति प्रेम नहीं है, उसने बडी चूक की है ।’ प्रत्यक्षमें कुटुंबका त्याग करनेवाला छोटा कुटुंब छोड विशाल कुटुंबसे एकरूप होता है । इससे उसकी प्रगति होती है; परन्तु साधककी साधनामें व्यवधान लानेके […]
सर्वधर्म समभाव’ यह किसी भी विचारकके विचारोंमें आना असम्भव है, क्योंकि सर्व धर्मोंकी शिक्षा समान नहीं है, उदा. – अ. अन्य धर्मोंमें केवल स्वर्गलोकतकका उल्लेख है । उनके अनुसार स्वर्ग अर्थात् ‘मौजमस्ती’ करनेका, सुख ही सुख उपभोगका स्थान है । आ. ‘अपना ही धर्म सर्वश्रेष्ठ’ ऐसी अहंभावकी प्रवृत्ति अन्य धर्मोंमें है । इसके विरुद्ध ‘जितने […]
हिन्दू राष्ट्रके राज्यकर्ता (शासक) प्रजाको माता-पिता समान लगेंगे ।-परात्पर गुरु डॉ . जयंत आठवले
अध्यात्म छोड अन्य किसीभी विषयमें पदव्युत्तर शिक्षण (डॉक्टरेट) होनेपर, नया सीखनेका सुख नहीं मिलता; क्योंकि उन विषयोंमें पृथ्वीपर उपलब्ध मर्यादित ज्ञान होनेसे नया सीखने जैसा कुछ नहीं बचता । उनके लिए समाचार पत्रके समाचार ही नए होते हैं । इसके विपरीत अध्यात्ममें अनुभूति और ज्ञानके माध्यमसे प्रतिदिन अनेक बार नित्य नूतनताका अनुभव होता है । […]
भारतीय लोकतंत्रका लज्जास्पद स्वरुप ! पूर्वमें चुनावमें दो अच्छे प्रत्याशियोंमें (उम्मीद्वारोंमें) अधिक अच्छे प्रत्याशीको (उम्मीद्वारको) मतदाता अपना मत देते थे | अब दो बुरेमें कम बुरा कौन या जो अधिक धन दे, उसे चुनते हैं । – परम पूज्य डॉ. जयंत आठवले (७.१२.२०१३)
सर्वसामान्य व्यक्ति कहता है “कठिन समय आनेपर कौन काम आता है “ ? इसके विपरीत साधक कहता है “कठिन समय आनेपर भगवान श्रीकृष्ण काम आते हैं “ | (यहां कामका अर्थ सहायता करना है -तनुजा ठाकुर ) – परात्पर गुरु डॉ. आठवले