श्रीगुरु उवाच

श्री गुरु उवाच


मुखके सौन्दर्यसे अधिक ईश्वरविषयी भाव महत्त्वपूर्ण !                                     पहले स्त्रियां साधना करती थीं; इसलिए उनके मुखपर सात्त्विकता हुआ करता थी; अतः उन्हें कृत्रिम सौन्दर्यकी आवश्यकता नहीं होती थी । इससे ज्ञात होता है कि, पूर्वकालमें सौंदर्यवर्धनालय (ब्यूटी पार्लर) क्यों नहीं हुआ करते थे । आज सभीने साधना छोड दी है; इसलिए उन्हें सुन्दर दिखनेके लिए […]

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श्रीगुरु उवाच


पूरे देश में १३६ वर्षोंसे सवा तीन कोटि परिवाद निर्णयकी प्रतीक्षामें हैं; इसलिए वाराणसीके न्यायालयमें वर्ष १८७८से प्रलंबित परिवाद हैं । ‘न्यायालयोंकी संख्यामें वृद्धि करनी चाहिए’, यह विचार एक भी सत्ताधारी राजनीतिक दलके मनमें क्यों नहीं आता ? ‘यदि न्यायालयमें निर्णय शीघ्रगति से प्राप्त हुए, तो हमें कारागृहमें जाना पडेगा’, क्या इस भयसे वे ऐसा […]

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श्रीगुरु उवाच


मैं साधकोंके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करता हूं ! मेरा हिन्दू राष्ट्रका स्वप्न सत्य होनेके लिये १०० संतोंकी आवश्यकता है । संतोंद्वारा प्रक्षेपित होनेवाले सत्त्वगुणके कारण पृथ्वीपर रज –तमका प्रदूषण न्यून होकर हिन्दू राष्ट्रकी स्थापना और जगभरमें हिन्दु धर्मका प्रसार–कार्य सुलभ होगा । अब तक ४२ संत हुए हैं । ४९१ साधक ६० प्रतिशतसे अधिक स्तरके […]

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श्री गुरु उवाच


ब्राह्मणो ! आरक्षणके कारण ‘नौकरी’ नहीं मिलती, यह सोच दुःखी होनेके स्थानपर पौरोहित्य सीखें तथा व्यष्टि एवं समष्टि साधनाकर स्वयंका तथा अन्योंका कल्याण करें ! आरक्षणके कारण ब्राह्मणोंको नौकरी नहीं मिलती, इसका दुःख करनेके स्थानपर उसका लाभ प्राप्त करने हेतु वे पौरोहित्य सीखें ! अन्य कोई भी व्यवसाय मनःपूर्वक करनेसे साधना नहीं होती; किन्तु पौरोहित्य, […]

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श्रीगुरु उवाच


हिन्दुत्त्ववादियो, कार्य कितना हुआ इसकी अपेक्षा कितना शेष है इसपर विचार करें ! अन्य हिंदुत्ववादीसे मिलनेपर स्वत: क्या किया है, यह न बताते हुए आगे सभी एकत्रित होकर क्या कर सकते हैं इसपर विचार करें ! तभी भेंट करना परिणामकरक होगा | क्या किया, यह बतानेसे अहम् भाव बढता है, जबकि एकत्रित होकर आगे कार्यके […]

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व्यष्टि एवं समष्टि साधनामें भाव आवश्यक है !


व्यष्टि साधनामें तन, मन एवं धनका त्याग होता है | समष्टि साधनामें तन, मन, धनके त्यागके साथ ही तडप, जिज्ञासा, सीखनेकी वृत्ति और समष्टिका नेतृत्व कर पाना इत्यादि गुण आवश्यक होता है | दोनों ही प्रकारकी साधनामें भाव आवश्यक होता है | भावका इतना महत्व है | – परम पूज्य डॉ. जयंत आठवले (आषाढ कृष्ण […]

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श्रीगुरु उवाच


साधारण व्यक्ति स्वेच्छाकी तृप्तिको प्रधानता देता है, साधक परेच्छा अनुसार वर्तन करता है और सन्त मात्र ईश्वरेच्छा अनुसार आचरण करते हैं । -परात्पर गुरु डॉ जयन्त आठवले भावार्थ : साधारण व्यक्ति स्वेच्छा अनुसार वर्तन करता है अर्थात उसके लिए स्वयंकी इच्छा पूर्ति अधिक महत्त्व रखता है, साधक परेच्छा अनुसार वर्तन करता है अर्थात दूसरोंकी इच्छाको […]

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श्रीगुरु उवाच


हिन्दू राष्ट्रकी स्थापनाके महायुद्धमें भगवान श्रीकृष्ण पंचमहाभूतोंसे संबंधित अस्त्रोंका प्रयोग कर विजयी बनाएंगे । ‘बहुसंख्य हिन्दू संस्कृतिहीन, धर्माभिमानशून्य एवं मृतवत् हैं; ऐसेमें वे हिन्दू राष्ट्र कैसे स्थापित कर सकेंगे ?’, इसका उत्तर है – ईश्वर मात्र एक भक्तके लिए भी दौडे चले आते हैं । हिन्दू राष्ट्र हेतु प्रयासरत कुछ सहस्र भक्तोंके लिए तो वे […]

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श्रीगुरु उवाच : प्रार्थनाके चरण


अहंको न्यून करने हेतु प्रार्थना आवश्यक होता है | प्रार्थना करते समय भी अल्प प्रमाणमें स्वेच्छा रहती है | यदि पूर्ण विश्वास हेतु प्रार्थना की तब भी उसमें स्वेच्छा होती है | आगे ईश्वरेच्छापर सब कुछ समर्पित करनेपर प्रार्थनाके स्थानपर निर्विचार अवस्था और शांतिकी अनुभूति होने लगती है |  -परात्पर गुरु डॉ जयंत आठवले

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श्रीगुरु उवाच


कहां चौदह सहस्र वर्ष राज्य करनेवाले प्रभु श्रीराम और कहां पांच वर्षमें प्रजाद्वारा सत्ताच्युत होनेवाले आजके राजकीय पक्ष ! सत्ताधारी पक्ष यदि चुनावमें हार गए तो उसका अर्थ है कि उन्होंने राज्यके कार्यभारका योग्य प्रकारसे निर्वाह नहीं किया | ऐसे पक्षको मात्र सत्ताच्युत करनेसे उन्हें दंड नहीं मिलेगा अपितु प्रजाकी अपरिमित हानि करने हेतु उन्हें […]

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