श्रीगुरु उवाच

श्रीगुरु उवाच


विषयको समझने हेतु बौद्धिक स्तरकी अपेक्षा आध्यात्मिक स्तर अधिक श्रेष्ठ ! सूक्ष्म समझनेमें आनेपर, प्रारम्भिक कालमें यदि कोई आगसे घिरा दिखाई देता या पता चलता तो आग जलसे बुझ जाती है, यह बुद्धिको ज्ञात होनेके कारण आप तत्त्वसे संबन्धित जल देवताका जप करनेके लिए कहता था | जब आगे और अध्यात्मका अभ्यास हुआ तो ज्ञात […]

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न्यायालयीन प्रक्रियामें जनताका हर प्रकार दोहन करनेवाले लोकतन्त्रको ही फांसीपर चढाकर हिन्दू राष्ट्रकी स्थापना करें !


१. लोकतन्त्रकी न्यायप्रणाली अ. शारीरिक दोहन : अपना सर्व कार्य छोडकर निश्चित दिनांकको न्यायालयमें उपस्थित रहना पडता है । कई बार पुलिसकी यातनाएं भी सहनी पडती हैं । आ. आर्थिक दोहन : अधिवक्ताओंके शुल्क हेतु प्रतिवर्ष अनेक कोटि रुपयोंका व्यय होता है । इ. मानसिक दोहन : देशभरमें ३ कोटि १४ लक्ष प्रकरण निर्णय हेतु […]

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निरंतर जलनेवाला दीपक अर्थात् आत्मज्योत (ब्रह्म) । यह स्थिर होता है


प.पू. भक्तराज महाराज : निरंतर जलनेवाले दीपकका ओर किसीका ध्यान नहीं जाता । झिलमिलाता दीपक सभीका ध्यान आकर्षित करता है । भावार्थ : निरंतर जलनेवाला दीपक अर्थात् आत्मज्योत (ब्रह्म) । यह स्थिर होता है । झिलमिलाता दीपक अर्थात् माया । इसकी ओर सभीका ध्यान तुरंत आकर्षित होता है ।

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धर्मांधोंका तुष्टिकरण करनेवाले राजकीय पक्षोंने आतंकवादियोंको चुनाव हेतु प्रत्याशी घोषित किया, उनके स्मृतिदिनको ‘राष्ट्रीय दिन’ कहकर मनाया अथवा उन्हें ‘भारतरत्न’से पुरस्कृत किया तो आश्चर्य नहीं होगा ।  (३०.३.२०१४)

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श्रीगुरु उवाच


बुद्धिप्रामाण्यवादी, पुरोगामी, जात्यंध, साम्यवादी इत्यादिके कारण हिन्दुओंमें फूट पडकर राष्ट्र अतिशय अशक्त (कमजोर) हो गया है । हिन्दू राष्ट्रकी स्थापनाके लिए धर्मयुद्धमें प्रथम धर्मयुद्ध, इन्हींसे आरम्भ होगा । -परात्पर गुरु डॉ जयंत आठवले (२.३.२०१५)

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नींदसे आनंद प्राप्त होता है तो, ध्यानसे कितना आनंद प्राप्त होता होगा ! -परात्पर गुरु डॉ जयंत आठवले (१९.७.२०१४)

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श्रीगुरु उवाच


आधुनिक पीढी लैंगिक शिक्षणके कारण उद्ध्वस्त न हो; इसलिए हिन्दू राष्ट्रमें उस शिक्षणपर प्रतिबन्ध होगा ! सत्य, त्रेता और द्वापर युगमें लैंगिक विषयोंपर कोई चर्चा नहीं होती थी । उसकी आवश्यकता भी नहीं लगी; क्योंकि लैंगिकता एक नैसर्गिक विषय है । पशु-पक्षियोंको भी इसका शिक्षण कोई नहीं देता, कैसे निद्रा लें ?, यह जैसे सीखना […]

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श्रीगुरु उवाच


परम पूज्य डॉ. आठवले एवं अन्योंके लेखनमें भेद                               मेरा लेखन बहुधा आध्यात्मिक भाषामें होता है, उसमें क्या सीख सकते हैं, यह अधिक प्रमाणमें होता है । उसमें भावना या भावका स्तर अल्प होता है; अतः अनेक व्यक्तियोंद्वारा उसे पढना कठिन होता है । इसके विपरीत अन्योंके लेख भावना या भावके स्तरपर एवं सरल भाषामें […]

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श्रीगुरु उवाच


आजकल अनेक घरोंमें बच्चोंके साधनाका विरोध करनेवाले हिरण्यकश्यपु तथा कैकेयी हैं ! सत्ययुगमें एक हिरण्यकश्यपु था । उसका पुत्र प्रह्लाद साधना करता था, इसलिए हिरण्यकश्यपुने उसके साथ अतिशय छल किया । उसके प्राण लेने हेतु अनेक प्रयत्न किए; परन्तु प्रह्लादकी ईश्वरने प्रत्येक बार रक्षा की । अब कलियुगमें एक हिरण्यकश्यपु नहीं; अपितु अनेक घरोंमें हिरण्यकश्यपु […]

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ग्रन्थोंसे होनेवाला लाभ


ग्रन्थोंसे होनेवाला लाभ धर्मविषयी लेखन करते समय जिस प्रकार धर्मग्रन्थोंका लाभ होता है, उसीप्रकार राष्ट्र सम्बन्धित लेखन करते समय विचारकोंका ग्रन्थ तथा लेखोंका लाभ होता है; फलस्वरूप स्वयं अनेक वर्ष विचार कर किसी विषय सम्बंधित लिखनेमें समय व्यर्थ नहीं होता । (१६.१.२०१४) -परात्पर गुरु डॉ जयंत आठवले

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