समलैंगिकोंका साथ-साथ रहना भारतीय परिवारके विरुद्ध बताते हुए केन्द्र शासनने किया विरोध


२७ फरवरी, २०२१
   केन्द्र शासनने समलैंगिक विवाहकी मांगको अमान्य कर दिया है । केन्द्र शासनका कहना है कि विवाह दो समान लिङ्गोंके मध्य होना अमान्य है । ऐसे विवाहको भारतीय संस्कृति स्वीकार नहीं करती और न ही इसे भारतीय परिवार माना जा सकता है । ऐसे विवाहको मान्यता देनेका कोई मौलिक अधिकार नहीं है ।
  अभिजीत अय्यर, गोपी शंकर एम, गीती थडानी तथा जी. ओवरसी द्वारा प्रविष्ट कराई गई याचिकाको केन्द्र शासनने अमान्य कर दिया ।
  केन्द्र शासनकी ओरसे महाधिवक्ता तुषार मेहताने इसका विरोध किया और कहा कि हमारे देशमें विवाह, एक पुरुष और एक महिलाके मध्य सम्बन्धकी वैधानिक मान्यताके अतिरिक्त, आयु, रीतियों, प्रथाओं, सांस्कृतिक लोकाचार और सामाजिक मूल्योंपर निर्भर करता है, जहांपर पति और पत्नीके मिलनसे सन्तानें उत्पन्न होती हैं । इसके अतिरिक्त विधान उन दो हिन्दुओंको विवाहकी अनुमति देता है, जिसमें पुरुष २१ वर्ष और महिला १८ वर्षकी हो चुकी होती है । इस तथ्यसे स्पष्ट होता है कि विवाह पुरुष और महिलाके मध्य होनेकी मान्यता है ।
 तुषार मेहताने समलैंगिकताका विरोध करते हुए कहा कि यह याचिका प्रविष्ट करनेके योग्य भी नहीं है ।
      समलैंगिक विवाह पाश्चात्य देशोंकी देन है, जहांपर बच्चोंका पालन करना, एक भोगवादी परिवारके लिए जीवनभर संन्यास लेनेके समान होता है । वहांपर स्वेच्छाचारी पुरुष व महिलाएं पशुओंकी भांति कहीं भी विचरते हैं । उन्हें बच्चे पालनेके स्थानपर कुत्ते पालना अधिक प्रिय है । भारत एक प्राचीन संस्कृतिका देश है और यहां समलैंगिकता सर्वथा अनुचित है । – सम्पादक, वैदिक उपाासना पीठ
 
 
स्रोत : ऑप इंडिया


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