शाहरुख-कबीर खानको बीजिंग चलचित्र महोत्सवमें बुलाया, ‘रॉकस्टार’से ‘फ्री तिब्बत’का ध्वज हटवाया, ‘बॉलीवुड’में चीनकी बढती मनमानी और घुसपैठ 


९ सिंतबर, २०२१
     विस्तारवादी नीतिके साथ अपना प्रत्येक पग बढानेवाला चीन, भारतके कई क्षेत्रोंमें प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूपसे घुसपैठ करके, देशके लिए घातक बन रहा है । भारतीय प्रबुद्ध मण्डल (थिंक टैंक), विधि एवं समाज गठबन्धनने (Law and Society Alliance) अपने एक अध्ययनमें प्रतिवाद किया है कि चीन अपने गुप्त षड्यन्त्रोंके अन्तर्गत भारतमें रणनीतिक क्षेत्रोंमें निवेश बढानेके साथ अपना प्रभाव बढा रहा है । उनके लक्ष्यमें भारतका मनोरंजन उद्योगसे लेकर विश्वविद्यालय, सामाजिक संस्थान, ‘सोशल मीडिया’, प्रबुद्ध मण्डल एवं तकनीकी उद्योग हैं । प्रतिवेदनमें अनेक उदाहरण देकर समझाया गया है कि कैसे चीन विभिन्न क्षेत्रोंमें घुसपैठ कर रहा है ?
       ‘बॉलीवुड’ क्षेत्रकी बात करें तो चीनी प्रतिष्ठान (कम्पनियां) ‘को-प्रोडक्शन’के रूपमें कार्य करके क्षेत्रमें घुसी हुई हैं । इसका सबसे बडा उदाहरण २०१९ में देखनेको मिला था, जब ‘बीजिंग इंटरनेशनल फिल्म फेस्टविल’ आयोजित हुआ था । उस मध्य चीनने कार्यक्रममें अभिनेता शाहरुख खान और निर्देशक कबीर खानकी भागीदारीको भी सफलतापूर्वक सुनिश्चित कर लिया था ।
       प्रतिवेदनके अनुसार भारतके चलचित्र जगतमें बीजिंगका प्रभाव बढानेके लिए चीनकी ‘कम्युनिस्ट पार्टी’ने एक ‘लॉबी ग्रुप बनाया’ है । इसका प्रमुख एक भारतीय है जो कार्य ही चलचित्र जगतके लिए कर रहा है । प्रतिवेदन बताता है कि बीजिंगका प्रभाव अत्यधिक सूक्ष्म हैं; किन्तु साथ ही व्यवस्थित भी है । इसके अतिरिक्त, इस अध्ययनके माध्यमसे यह भी प्रतिवाद किया गया है कि चीन अपने हितोंको साधनेके लिए ‘फिल्म रेगुलेटरीज बॉडी’में प्रमुख लोगोंको अपने पक्षमें करनेमें सफल रहा है ।
      चीनका चलचित्र जगतपर कितना गहन प्रभाव है ? इसका अनुमान इस बातसे लगा सकते हैं कि २०११ में प्रकाशित हुई ‘रॉकस्टार’में जहां ‘फ्री तिब्बत’का ध्वज था, उसके निर्माताओंको उसे ‘सेंसर’ करना पडा । ऐसा क्यों हुआ ? इसका उत्तर चीन-तिब्बत विवाद है । तिब्बत दीर्घकालसे अपनी स्वतन्त्रताकी मांग कर रहा है; किन्तु चीन उसपर अपना अधिकार दर्शाता है । चीनका कहना है कि १३वीं शताब्दीमें तिब्बत, चीनका भाग था तो आज भी उसपर, उन्हींका अधिकार है । तिब्बतके वासी इस प्रतिवादको नहीं मानते, इसलिए ‘फ्री तिब्बत’का उद्घोष, वहांसे प्रायः सुननेको मिलता है ।
      वर्ष २०११ में, जब यही दृश्य चलचित्रके सङ्गीतमें दिखाया गया तो चलचित्र ‘रिलीज’के लिए मान्य नहीं हुआ । इसके पश्चात, जानकारी आई कि चित्रको (सीन) काट दिया गया है, इसलिए चलचित्रको ‘यू/ए सर्टिफिकेट’ मिलता है । ‘सेंसर बोर्ड’के इस प्रसङ्गसे तिब्बतके वासी व्यथित हुए थे एवं ‘सीन रिस्टोर’ करनेकी मांग की गई थी ।
      यदि सनातन धर्म एवं ईश्वरको सर्वप्रधान रखकर, चलचित्र उद्योग आदर्श एवं दिव्य अभिनयसे सुसज्जित चलचित्र बना रहा होता तो समस्त विश्वमें उसका यशगान होता व सर्वसामान्य समाज भी इससे प्रेरित होकर धर्मपरायण होता; किन्तु अर्थ, काम और क्षुद्र स्वार्थसे निहित, धूर्त नटोंको मानवद्रोही चीनसे गठजोड रखनेमें भी कोई सङ्कोच नहीं होता । हिन्दू राष्ट्रकी स्थापनासे पूर्व विश्वके प्रत्येक क्षेत्र और कार्यक्षेत्रमें हो रही धर्मग्लानिका सर्वनाश होना अवश्यम्भावी है, तभी मनुष्यता स्वतः ही सन्मार्गकी ओर अग्रसर होगी । – सम्पादक, वैदिक उपाासना पीठ
 
 
स्रोत : ऑप इंडिया


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