चूक लिखना अर्थात् ईश्वरके समक्ष आत्मनिवेदन करना


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जो साधक अपने चूक लिखते हैं वे सम्पूर्ण दिवस दससे बारह चूकें लिखनेका प्रयास करें; क्योंकि आपकी चूकोंको पढकर ऐसा नहीं लगना चाहिए है कि आप मात्र चूक लिखने हेतु यह कृति कर रहे हैं अर्थात् यह लिखना एक बंधन है ऐसा नहीं लगना चाहिए, एक सामान्य व्यक्तिसे दिन भरमें २०० चूकें करता है, ऐसेमें यदि आप एकसे अधिक वर्षोंसे चूक लिख रहे हैं और उसकी संख्या मात्र चार या पांच होती हैं तो आपकी अंतर्मुखता मात्र  दस प्रतिशत है, अध्यात्मिक प्रगति हेतु आपकी अंतर्मुखता ५० % होना अनिवार्य है ! अपने दोषोंको अल्प कर, दिव्य गुणोंको आत्मासात करने हेतु है, यह अति आवश्यक है, यह ध्यान रखें; इसलिए दिन भरमें जब-जब चूकें होती हैं, उसे एक छोटी अभ्यास-पुस्तिकामें अल्प शब्दोंमें लिखकर रखें ! चूक लिखना अर्थात ईश्वरके समक्ष आत्मनिवेदन करना है इस भावसे लिखें ! आप जितना प्रमाणिक होकर चूक लिखेंगे, ईश्वर आपकी उतनी ही सहायता करेंगे ! -तनुजा ठाकुर (२६.७.२०१४)



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