उत्तराखंडमें नेपाल सीमापर महाराणा प्रतापके वंशजों, सिखों, जनजातियोंका ईसाई धर्मान्तरण


२ सिंतबर, २०२१
     उत्तराखंड राज्यकी नेपाल सीमासे सटे खटीमा, नानकमत्ता और सितारगंज विधानसभा क्षेत्रोंमें ईसाई ‘मिशनरियों’द्वारा भारी संख्यामें धर्म परिवर्तन चल रहा है । ईसाई मिशनरी महाराणा प्रतापके वंशज माने जानेवाले थारू बुक्सा समुदायको ईसाई पन्थमें परिवर्तित करा रही हैं, इसके साथ ही सिखोंका भी पन्थ परिवर्तन कराया जा रहा है ।
     उत्तराखंड वर्ष २००० से पहले उत्तर प्रदेशका भाग था । देशका यह पर्वतीय भाग ईसाई मिशनरियोंके लक्ष्यपर इससे पहलेसे ही रहा है । कभी चिकित्सा तो कभी शिक्षाके ‘बहाने’ कथित सेवाकार्योंको पन्थ परिवर्तनके लिए सीढी बनाया जाता है । यह क्षेत्र पिछडा होनेके कारण ही इस क्षेत्रमें मिशनरियां सक्रिय हो गई हैं ।
    इस क्षेत्रमें थारू एवं बुक्सा जनजातियां निवास करती हैं । इन्हें महाराणा प्रतापका वंशज कहा जाता है । मुगलोंके आतङ्कके कारण वे जंगलोंमें आकर रहने लगे थे । स्वतन्त्रताके पश्चात यहीं वैध रूपसे बसाकर इन्हें जनजातिमें सम्मिलित किया गया था एवं चाकरियोंमें भी आरक्षण जैसी सुविधाएं दी गई थीं ।
     जो समुदाय कभी पूर्णरूपसे हिन्दू हुआ करता था, वह हिन्दू धर्मसे दूर होने लगा है । पैसे और अन्य लोभ देकर धर्म परिवर्तनका बडे प्रमाणमें चलाया जा रहा है । अबतक थारू बुक्सा जनजातिकी लगभग ३५% जनसङ्ख्या ‘मिशनरियों’द्वारा ईसाई बनाई जा चुकी है ।
       ईसाई मिशनरियोंद्वारा सञ्चालित एवं केन्द्र और विभिन्न राज्य शासनद्वारा पोषित मैकॉलेकी आधुनिक शिक्षा पद्धति ही मुख्य रूपसे  धर्म-परिवर्तनके लिए उत्तरदायी है । ईसाई ‘मिशनरियों’द्वारा संचालित शिक्षाकेन्द्र बडे प्रमाणमें अप्रत्यक्ष रूपमें धर्म परिवर्तनका केन्द्र बन गए हैं । हिन्दुओ, जिहादियोंसे कहीं अधिक ईसाई ‘मिशनरियां’ घातक हैं, जो धन और छलसे आदिवासियों एवं आर्थिक रूपसे दुर्बल लोगोंको लक्ष्य बनाकर देशके सुदूर क्षेत्रोंमें धर्म-परिवर्तन कर रहीं हैं । केन्द्र शासनको चाहिए कि ऐसे सङ्गठनोंके विरुद्ध कठोर कार्यवाहीकर ईसाई ‘मिशनरियों’द्वारा कराए जा रहे धर्म परिवर्तनके अभियानपर प्रभावी रोक लगाए । – सम्पादक, वैदिक उपाासना पीठ
 
 
स्रोत : डू पॉलिटिक्स


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