जनवरी २२, २०१९
मद्रास उच्च न्यायालयने एक निर्णयमें कहा है कि बौद्ध धर्म जाति रहित है और इस धर्मको अपनानेवालोंको अनुसूचित जातिका लाभ नहीं दिया जा सकता । न्यायाधीश आर सुब्बिहा और आर पोंगिअप्पनकी पीठने कहा, “संविधानके अनुसार निर्धारित अनुसूचित जाति सूचीमें बौद्ध धर्मकी आदि द्रविडके रूपमें कोई प्रविष्टि नहीं है । इस प्रकरकी अधिसूचना न होनेके कारण इस समुदायके लोगोंको अनुसूचित जातिका प्रमाणपत्र नहीं दिया जा सकता है ।
न्यायालयने यह निर्णय उस याचिकामें सुनाया है, जिसमें याची जीजे तमिलारासूकी ओरसे इरोड जिलाधिकारीसे चाकरीके लिए अनूसूचित जातिका प्रमाणपत्र मांगा गया था । वैसे इस आवेदनको २४ अगस्त २०१७ को निरस्त कर दिया गया था, जिसके पश्चात याचीने उच्च न्यायालयमें याचिका प्रविष्ट की थी ।
तमिलारासूका जन्म ५ दिसंबर १९७० को हुआ था । उनके माता-पिता ईसाई थे और उन्होंने उनका नाम विक्टर जोसेफ रखा था । जब वह ११वीं कक्षामें थे तो उन्होंने १२ जून १९८९ में स्वयंको ईसाई आदि द्रविड बताते हुए अनूसूचित जातिका प्रमाणपत्र प्राप्त कर लिया था । उन्होंने धर्म परिवर्तन करके बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया और अपना नाम परिवर्तितकर जीजे तमिलारासू कर लिया । सितम्बर २०१५ को उन्होंने स्वयंको बौद्ध धर्मका आदि द्रविड बताते हुए अनुसूचित जातिके प्रमाणपत्रके लिए आवेदन किया । यद्यपि प्रशासनने उनका आवेदन यह कहते हुए निरस्त कर दिया कि उन्होंने केवल अनुसूचित जातिका प्रमाणपत्र पानेके लिए धर्म परिवर्तन किया है । आवेदन निरस्त होनेके पश्चात उन्होंने उच्च न्यायालयमें याचिका की थी ।
याचीने मांग की थी कि शासनको निर्देशित किया जाए कि धर्म परिवर्तन करनेवालेको यदि समुदायके लोग अपना लेते हें तो उन्हें उस जातिका प्रमाणपत्र दिया जाए । शासनकी ओरसे कहा गया कि याचीका जन्म ईसाई धर्ममें हुआ था । उन्होंने अप्रैल २०१५ तक ईसाई धर्म ही माना और यह समुदाय पिछडी जातिमें आता है । उन्होंने यह भी कहा कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति संशोधन अधिनियम १९७६ में भी बौद्ध धर्मको कहीं भी आदि द्रविड नहीं बताया गया है; इसलिए उन्हें अनुसूचित जातिका प्रमाणपत्र नहीं दिया जा सकता ।
“राज्यकर्ताओंके स्वार्थके कारण ही आरक्षण रूपी कोढ अभीतक देशसे चिपका है, अन्यथा जाति- धर्म ईसाई हो या बौद्ध या अन्य कोई, आरक्षण किसीको भी नहीं मिलना चाहिए । यह तो कोई भी विवेकी मनुष्य बता सकता है कि ज्ञान न रखनेवाला चिकित्सक अनुसूचित जातिका हो अथवा नहीं, वह तो रोगीको मारेगा ही ! आरक्षणका लाभ लेअर अयोग्य बालक आगे आते है और अब लोग धर्मपरिवर्तन भी करने लगे हैं; अतः अब इस कोढसे छुटकारा पानेकी उपाय योजना बनानी चाहिए !”- सम्पादक, वैदिक उपासना पीठ
स्रोत : ईपोस्टमोर्टम
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