दैवी और आसुरी संस्कृतिमें भेदकी एक क्षणिका


ख्रिस्ताब्द २०१४ में धर्मयात्राके मध्य हम इटलीसे जर्मनी चार पहिये वाहनसे जा रहे थे । चूंकि बारह घण्टेका प्रवास था; अतः मध्याह्न, राजमार्गमें एक स्थानपर, जहां रुककर भोजन करनेकी व्यवस्था भी थी, हम सभी भोजन करने लगे । भोजनसे पूर्व हम हाथ धोकर, एक स्थानपर बैठकर, थालीमें भोजन निकालकर, गिलासमें जल लेकर, नैवेद्य अर्पण कर, प्रसाद ग्रहण करने लगे । उसी समय वहां अन्य कुछ यूरोपीय लोग, अपने वाहनोंमें आए, उन्हें भी भोजन करना था । उन्होंने अपने वाहनके पिछले द्वारको खोला, उससे भोजन निकालकर वाहनपर एक पांव रखते हुए मुखको फाडकर (बिना मुंह फाडे आप बर्गर नहीं खा सकते हैं), एक हाथमें बर्गर, दूसरे हाथमें मद्यकी बोतल (बियरकी बोतल) लेकर उसे खाने लगे और बिना हाथ धोए एक कागदसे मुख स्वच्छ कर चले गए !

मेरे साथ गए सभी भारतीय हिन्दू, जो अज्ञानता एवं स्वधर्माभिमानके अभावमें, पाश्चात्योंकी पैशाचिक संस्कृतिकी प्रशंसा करते नहीं थकते हैं, मैंने उन्हें, पाश्चात्योंके भोजन करनेकी पद्धतिकी समीक्षा करने हेतु कहा एवं तत्पश्चात उन्हें दैवी पद्धतिसे भोजन करने और आसुरी पद्धतिसे भोजन करनेके, इस भेदको समझने हेतु कहा । उन्हें ईश्वरको कृतज्ञता व्यक्त करने हेतु भी कहा; क्योंकि उन्होंने हमें इस दैवी धर्म और संस्कृतिमें जन्म देकर हमपर बडा उपकार किया है !



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