अक्तूबर २३, २०१८
सहारनपुर स्थित इस्लामिक शिक्षण संस्थान दारुल उलूम देवबंदने ‘हलाला प्रथा’को लेकर आदेश जारी किया है । अपने फतवेमें (आदेशमें) दारुल उलूम देवबंदने कहा कि एक योजनाके अन्तर्गत कराया गया हलाला, इस्लाममें ‘नापंसद और नाजायज’ (अयोग्य) है ! मोहल्ला अब्दुलहक निवासी मोहम्मद उस्मानने दारुल उलूमके फतवा विभागमें मुफ्तियोंकी खण्डपीठसे लिखितमें हलालाको लेकर प्रश्न किया था, जिसके उत्तरमें मुफ्तियोंने कहा कि तलाकके पश्चात् वह महिला, शौहरपर ‘हराम’ हो जाती है । उन्होंने कहा कि महिलाको ये अधिकार मिल जाता है कि वह तलाक देने वाले पुरुषके अतिरिक्त जिस किसी भी व्यक्तिसे चाहे निकाह कर सकती है । इसके पश्चात् यदि कुछ लोग हलालाके नामपर बैठकर यह निर्धारित कर देते हैं कि महिला दूसरे व्यक्तिके साथ केवल हलाला करेगी और पुनः अपने पुराने पतिके साथ निकाह करेगी तो यह अनुचित है ।
देवबन्दी उलेमा मुफ्ती असद कासमीने बताया कि इस्लाममें ये अयोग्य है और इसे इस्लाममें ‘लानत’ माना गया है । महिलापर तीन तलाक होनेके पश्चात् उसे दूसरा विवाह करनेका पूर्ण अधिकार हो जाता है । उसपर किसी भी प्रकारका दबाव डालना योग्य नहीं है ।
उन्होंने बताया कि इस्लाममें महिलाको स्वततन्त्रता है कि वह अपने पहले पतिके अतिरिक्त जिसे चाहे अपने विवाहके लिए चुन सकती है । मुफ्ती असद कासमीने बताया कि पहले पतिसे पुनः विवाह करनेके लिए दूसरे पतिसे बलात् तलाक कराना योग्य नहीं है, लेकिन यदि दूसरा पति स्वयं ही किसी कारणसे उसको तलाक दे दें, तो पुनः महिलाको विवाहका अधिकार हो जाएगा ।
“हमारे पूर्वजोंने एकल विवाहके नियम दिए, जो मनुष्यकी ईश्वर प्राप्तिकी यात्रा सबल बनाए । क्या यह पशु समान बहु-विवाह अथवा विवाह हीन उच्छृंखलतामें सम्भव है क्या ? इससे सनातनकी महानता ज्ञात होती है ।” – सम्पादक, वैदिक उपासना पीठ
स्रोत : जी न्यूज
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