दीपावली मनानेके लिए पटाखोंका प्रयोग कर धर्महानि मत कीजिए !


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दीपावली मनोरंजनके लिए नहीं; अपितु यह धार्मिकता एवं भारतीय संस्कृतिको संजोए रखनेका त्यौहार है : दीपावलीका आनंद लेने हेतु छोटे-बडे सभी सार्वजनिकरूपसे पटाखे जलाते हैं । ध्यान रखिए, प्रसन्नता व्यक्त करनेके लिए पटाखे जलानेकी आवश्यकता नहीं होती । ध्वनिप्रदूषण एवं वायुप्रदूषण करनेवाले पटाखे अपने लिए और अन्योंके लिए भी उतने ही हानिकारक होते हैं । अन्योंको कष्ट देकर उत्सव मनाना हिंदू धर्ममें निंदनीय माना जाता है । दीपावलीकी कालावधिमें उचित पद्धतिसे धर्माचरण करनेसे ही खरे आनंदका अनुभव लिया जा सकता है । आप भी इसकी अनुभूति अवश्य लें ।

पटाखे जलानेके दुष्परिणाम :

अ. शारीरिक दुष्परिणाम : पटाखोंके धमाकेके कारण बधिरता आना, पटाखोंके उद्योगक्षेत्रमें होनेवाले विस्फोटसे अनेक लोगोंकी मृत्यु होना आदि ।
आ. भौतिक दुष्परिणाम : बाणसमान पटाखोंके कारण घासके ढेर इत्यादिके आग पकडनेसे आग लगना ।
इ. आर्थिक दुष्परिणाम : देशके दिवालिया होते हुए भी प्रतिवर्ष करोडों रुपए (के पटाखे) जलाना पाप ही है ।
ई. आध्यात्मिक दुष्परिणाम : भजन, आरती अथवा सात्त्विक नादसे देवताओंका आगमन होता है, किंतु आजकलके वातावरणमें तामसिक आधुनिक संगीत एवं पटाखोंकी कर्कश ध्वनि अधिक होनेके कारण उसके प्रभावसे व्यक्तिकी वृत्ति तामसिक बनती है ।
इसलिए दीपावलीमें न तो स्वयं पटाखे जलाएं और न ही अपने बच्चोंपर भी पटाखे जलानेका संस्कार डालें । इसके साथ ही इस विषयमें अन्योंका भी प्रबोधन करें ! परात्पर गुरु – तनुजा ठाकुर



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