महलोंको छोड अम्बानीने अपने पुत्रके विवाहके लिए चुना उत्तराखण्डका यह देवस्थल !


अगस्त ४, २०१८

देशके सबसे बडे उद्योगपति मुकेश अम्बानीके पुत्र आकाश और हीरा कारोबारी रसेल मेहताकी पुत्री श्लोकाका विवाहकी कुछ रीतियां, मध्य हिमालयमें स्थित त्रियुगीनारायण मन्दिरमें पूरी कर सकते हैं । इसे विवाहके लिए सज्ज किया जा रहा है । मार्च २०१८ को रुद्रप्रयागमें मुख्यमन्त्री त्रिवेन्द्र सिंह रावतने इसे विवाह गन्तव्य (वेडिंग डेस्टिनेशन) घोषित किया था । ऐसी मान्यता है कि उत्तराखण्डकी पहाडियोंके मध्य इस मन्दिरमें भगवान शिव और माता पार्वतीका विवाह हुआ था ।

मान्यता है कि भगवान शंकरने हिमालयके मन्दाकिनी क्षेत्रके त्रियुगीनारायणमें माता पार्वतीसे विवाह किया था । इसका प्रमाण है यहां जलने वाली अग्निकी ज्योति जो त्रेतायुगसे निरन्तर जल रही है । कहते हैं कि भगवान शिवने माता पार्वतीसे इसी ज्योतिके समक्ष विवाहके फेरे लिए थे । तब से अबतक यहां अनेक युग्म विवाह बन्धनमें बन्धते हैं । लोगोंका मानना है कि यहां विवाह करनेसे दाम्पत्य जीवन सुख से व्यतीत होता है । त्रेतायुगका ये शिव-पार्वतीके विवाहका स्थल रुद्रप्रयाग प्रान्तके सीमान्त गांवमें त्रियुगीनारायण मन्दिरके रूपमें वर्तमानमें आस्थाका केन्द्र है ।

केदारनाथ और बद्रीनाथ धामके साथ ही मध्य हिमालयमें स्थित त्रियुगीनारायण मन्दिरसे देशके उद्योगपति अम्बानी कुटुम्बका पुराना सम्बन्ध रहा है । ४० वर्ष पूर्व १९७८ में धीरू भाई अम्बानी अपने दोनों पुत्रोंके साथ त्रियुगीनारायण मन्दिरमें आकर भगवानका आशीर्वाद लिया था । यहांपर पूजा अर्चना करनेके पश्चात वह केदारनाथ दर्शनोंको गए थे ।

रुद्रप्रयागसे ८० किमी दूर गौरीकुण्डके निकट त्रियुगीनारायण मन्दिर स्थित है । लगभग पांच दिन पूर्व ‘रिलायंस ग्रुप’का चार सदस्यी दल पांच दिवस पूर्व त्रियुगीनारायण मन्दिर पहुंचा था और उन्होंने मन्दिरके स्थानके साथ-साथ यहां रहनेके लिए गढवाल मण्डल विकास निगमके भवनका भी निरीक्षण कर पूरी जानकारी ली ।

यह है पौराणिक कथा
हिन्दू पौराणिक ग्रन्थोंके अनुसार पार्वती पर्वतराज हिमावत या हिमावनकी पुत्री थी । पार्वतीके रूपमें सतीका पुनर्जन्म हुआ था । पार्वतीने आरम्भमें अपने सौन्दर्यसे शिव को रिझाना चाहा; लेकिन वे सफल नहीं हो सकी । त्रियुगीनारायणसे पांच किलोमीटर दूर गौरीकुण्ड कठिन ध्यान और साधनासे उन्होंने शिवका मन जीता । जो श्रद्धालु त्रियुगीनारायण जाते हैं, वे गौरीकुण्डके दर्शन भी करते हैं । पौराणिक ग्रन्थ बताते हैं कि शिवने पार्वतीके समक्ष केदारनाथके मार्गमें पडने वाले गुप्तकाशीमें विवाह प्रस्ताव रखा था । इसके पश्चात उन दोनोंका विवाह त्रियुगीनारायण गांवमें मन्दाकिनी सोन और गंगाके मिलन स्थलपर सम्पन्न हुआ ।

ऐसा भी कहा जाता है कि त्रियुगीनारायण हिमावतकी राजधानी थी । यहां शिव पार्वतीके विवाहमें श्रीविष्णुने पार्वतीके भाईके रूपमें सभी रीतियोंका पालन किया था । जबकि, ब्रह्मा इस विवाहमें पुरोहित बने थे । उस समय सभी सन्त-मुनियोंने इस समारोहमें भाग लिया था । विवाह स्थलके नियत स्थानको ‘ब्रह्म शिला’ कहा जाता है, जो कि मन्दिरके ठीक सामने स्थित है । इस मन्दिरके महात्म्यका वर्णन स्थल पुराणमें भी मिलता है ।

विवाहसे पूर्व सभी देवताओंने यहां स्नान भी किया और इसलिए यहां तीन कुण्ड बने हैं, जिन्हें रुद्र कुण्ड, विष्णु कुण्ड और ब्रह्मा कुण्ड कहते हैं । इन तीनों कुण्डमें जल सरस्वती कुण्डसे आता है । सरस्वती कुण्डका निर्माण श्रीविष्णुकी नासिकासे हुआ था और इसलिए ऐसी मान्यता है कि इन कुण्डमें स्नानसे सन्तानहीनतासे मुक्ति मिल जाती है । जो भी श्रद्धालु इस पवित्र स्थानकी यात्रा करते हैं, वे यहां प्रज्वलित अखण्ड ज्योतिकी भभूत अपने साथ ले जाते हैं, ताकि उनका वैवाहिक जीवन शिव और पार्वतीके आशीषसे हमेशा मंगलमय बना रहे ।

उत्तराखण्डके राज्य मन्त्री डॉ. धन सिंह रावत, कलाकार कविता कौशिक, आइएएस अपर्णा गौतम
उत्तराखण्डके पहले खण्डके पीसीएस प्रथम ललित मोहन रयाल व रश्मि रयालने यहां विवाह किया है ।

स्रोत : जी न्यूज



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