आज्ञापालनका संस्कार बाल्यकालसे अंकित करना अति आवश्यक


पालको ! अपनी सन्तानोंमें आज्ञापालनके गुणको आत्मसात् करानेके प्रयास करें ! मैंने धर्मप्रसारके मध्य पाया है कि आज अधिकांश लोगोंमें आज्ञापालनकी प्रवृत्ति नहीं है; इसलिए उन्हें कितना भी साधना एवं अध्यात्मका दृष्टिकोण देते रहे वे अपनी मनके अनुसार ही सर्व कृति करते हैं; परिणामस्वरूप मनके संस्कार दूर नहीं होते हैं और आज्ञापालनका संस्कार न होनेके कारण वे योग्यप्रकारसे कुछ भी शास्त्र अनुसार या सन्त आज्ञा अनुसार नहीं कर पाते हैं । हमारे माता-पिताने बाल्यकालसे ही आज्ञापालनका महत्त्व हमारे अन्तर्मनमें अंकित किया; इसलिए जब हम अपने गुरुके शरणमें साधना करने लगे तो उनकी आज्ञाका पालन अत्यन्त सहजतासे हो पाया । माता-पिता, गुरु श्रेष्ठजनकी आज्ञापालनसे उनका शुभाशीष हमें सहज ही प्राप्त होता है एवं गुरुकृपायोगानुसार साधनाका तो मूल आधार आज्ञाधाराकता ही है । कलियुगमें शीघ्र आध्यात्मिक प्रगति हेतु गुरुकृपायोगानुसार सर्वश्रेष्ठ एवं लघुपथ है; किन्तु यदि किसीमें इस मूल गुणका अभाव हो तो उसके लिए यह योगमार्ग अत्यन्त कठिन प्रतीत होता है -तनुजा ठाकुर



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