आजके आधुनिक बने हिन्दुओंकी स्थिति इतनी विदारक है कि समझमें नहीं आता कि उन्हें धर्म और अध्यात्मका प्रथम पाठ कहांसे पढाना आरम्भ किया जाए; क्योंकि आजके हिन्दुओंको सामान्य धर्माचरणका भी बोध नहीं रहा – सवेरे उठनेपर बिछावनमें ही बिना दन्त धावन या कुल्लाके चाय पीना आरम्भ कर देता है, मल-मूत्र त्यागके पश्चात अपने घरपर रहनेपर भी पांवतक नहीं धोता है; क्योंकि उनके मूल्यवान ‘टाइल्स’ और प्रसाधन गृह गीले हो जाएंगे, शौचालयमें शौच करते समय पुस्तक पठन करता है, छुट्टियोंके दिवस रात्रिके अंतिम प्रहरतक रज-तम प्रधान कार्यक्रम अपने दूरदर्शन संचपर देखता रहता है और दोपहरसे पूर्व उठता है, अपने घररूपी मंदिरमें चमडेके चप्पल पहनकर घूमता है, पूजाघरमें पालतू कुत्तोंके साथ पूजा करता है और उसे अपनी थालीमें भोजन करवाता है, सवेरे उठते ही ‘अल्लाह हु’ के संगीतपर थिरकते हुए मुख प्रक्षालन करता है, अपनी भारतीय वेशभूषा धारण करनेमें उन्हें लज्जा अनुभव होती है, हाथसे भोजन करना उसे असभ्यता लगती है; अतः चम्मचसे भोजनकर, भोजन करनेके पश्चात जूठे हाथको कागदके कपडेसे (पेपर नैपकिन) पोछ लेता है ! ऐसे कुसंस्कारी लोगोंको गीता, उपनिषद क्या सिखाया जाए, उन्हें तो सर्वप्रथम प्राथमिक स्तरका धर्माचरण सिखाकर सुसंस्कृत करनेकी आवश्यकता है, साधना और अध्यात्म तो बहुत आगेका चरण है । – पूज्या तनुजा ठाकुर
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