हरियाणाके एक साधक श्री मयंक गुप्ताने लिखा कि ‘उपासना’द्वारा बताई गई वास्तु शुद्धिकी पद्धतियोंके पालनसे उनके घरमें मच्छर नहीं आते हैं, जबकि घरके बाहर निकलते ही सीढियोंपर एवं पडोसियोंके घरपर मच्छर भिन-भिनाते रहते हैं ! यह तो चिरन्तन सत्य है कि सात्त्विकतासे सारे कीडे-मकोडे भागते हैं । पूर्वकालमें हम सब बिना पंखेके, मिट्टीके घरोंमें रहते थे, इतना ही नहीं, हमारे घरके पिछवाडेमें छोटीसी शाकवाडी (सब्जीका बगीचा) होती थी, जिसमें कुछ सात्त्विक वृक्ष भी होते ही थे, साथ ही गायें होती थीं, तब भी मच्छरोंका प्रमाण नगण्य रहता था, यह सात्त्विकताके कारण ही होता था ! साधना एवं धर्माचरणके अभावमें वर्तमान कालमें गांवोंमें भी उतनी सात्त्विकता नहीं रही; इसकी मैंने प्रत्यक्ष अनुभूति ली है । जब मैं ख्रिस्ताब्द २००८ से २०१० तक अपने पैतृक गांवमें थी तो हमारे गांवमें सभीके घरोंमें इतने मच्छर होते थे कि सन्ध्या समय होते ही लोग ‘मच्छरदानी’में घुस जाते थे और यदि खुलेमें सन्ध्या समयके पश्चात बात करनेका दुःसाहस करते तो मच्छरका मुंहमें घुसना निश्चित था; परन्तु मेरे निवासस्थानपर ऐसा नहीं था ! मैं देर राततक अपने संगणकपर बिना मच्छरोंके प्रकोपके सेवा कर सकती थी । साधक भी कई बार बिना मच्छरदानीके, ऊपरके कक्षमें सो जाया करते थे ! पूरे ‘विष्णु धाम’ (जहां मैं रहती थी) परिसरमें नाममात्रके मच्छर होते थे और यह सबके लिए आश्चर्यका विषय होता था !
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