हिन्दुओं, धर्माभिमान व धर्मरक्षणकी वृत्ति जागृत करें


आज हिन्दुओंमें धर्माभिमानका अत्यधिक ह्रास हुआ है; अतः जब कोई हमारे धर्मस्थल, धर्मगुरु, धर्मग्रन्थपर आघात करनेवाले घटकोंके बारेमें समाजको मुखर होकर बताता है तो वह कट्टर कहलाता है और मुझे तो लगता है कि ऐसा कट्टर होना गर्व और सौभाग्यकी बात है तथा जिन्हें यह धार्मिक असहिष्णुता लगती है, उन्होंने अन्तर्मुख होकर अपनी प्रवृत्तिका निरीक्षण अवश्य करना चाहिए; क्योंकि आसुरी तत्त्वोंसे अपना रक्षण करना और उसका विरोध करना, यह तो धर्म है और जो भी हमारी स्त्रियों, धर्म, धर्मस्थल, धर्मगुरुओं, गौमाता एवं धर्मसे सम्बन्धित किसी भी घटकपर आक्रमण करता है तो चाहे वह शत्रु कोई देश, पन्थ, पक्ष या व्यक्ति विशेष ही क्यों न हो, वह हमारा शत्रु ही है और उनसे रक्षण करना, उसके सम्बन्धमें धर्मजागृति कराना हमारा धर्मकर्तव्य है । इस तथ्यको हिन्दुओंके मनपर अंकितकर, इस सम्बन्धमें उनमें क्षात्रवृत्ति निर्माण करना परम आवश्यक है और इसे कट्टरता नहीं, धर्माभिमान और धर्मरक्षण कहते हैं ।



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