धर्मधारा


एक बार गोपियोंने बांसुरीसे पूछा, “अरी बांसुरी ! तू श्रीकृष्णके होठोंसे कैसे चिपक गई ?” बांसुरीने कहा, “क्या बताऊं बहना, मैं तो बांसोंके झुण्डमें चुपचाप ‘कृष्ण-कृष्ण’ रटा करती थी, एक दिन उनकी दृष्टि मुझपर पड गई, बस उसके पश्चात क्या बताऊं ?, सर्वप्रथम तो उस ‘छलिये’ने मुझे मेरे कुटुम्बसे दूर कर दिया, तत्पश्चात मुझे काटा और छांटा, पीडा तो बहुत हो रही थी; परन्तु मैं ‘कृष्ण-कृष्ण’ करती रही । उनका मन इतना सताकर भी न भरा तो मेरे अन्दर जो भी था वह सब निकाल बाहर फेंका और तब भी मैं प्रेम दीवानी ‘कृष्ण-कृष्ण’ करती रही, तब उस ‘चित्तचोर’ने मेरे अंगमें छह छेद कर दिए । मैं पगली तब भी ‘कृष्ण–कृष्ण’ करती रही, अन्तमें कृष्णने कहा, “तू जीती, मैं हारा, अब तू सदा मेरे होठोंपर विराजमान रहेगी !” – तनुजा ठाकुर



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