फिनलैण्डमें हुई ‘आईएएएफ वर्ल्ड अण्डर-२० ऐथलेटिक्स चैम्पियनशिप’में १८ वर्षकी भारतीय धावक हिमा दासने इतिहास रच दिया ! उन्होंने महिलाओंके ४०० मीटर अन्तिम (फाइनल) दौडमें ५१.४६ सेकण्ड समय निकालते हुए प्रथम स्थान प्राप्त कर स्वर्ण पदक जीता ! वह ऐसा करने वाली प्रथम भारतीय महिला बनीं, किन्तु इस देशकी मानसिकता देखें कि ‘एथलेटिक्स फेडरेशन ऑफ इण्डियाने’ उन्हें सिर-आंखोंपर बैठानेके स्थानपर उनकेद्वारा धाराप्रवाह अंग्रेजी भाषामें अपने विचार न व्यक्त करनेकी आलोचनाकी है ! क्या अंग्रेजीमें बोलना ही इस देशके लिए सम्मानकी बात है, हम इस दासतासे कब मुक्त होंगे ? एक सामान्य कृषककी पुत्री भारतके लिए इतना बडा सम्मान लाती है और वह मात्र अंग्रेजी नहीं बोल सकती है; इसलिए उसका अपमान करना, क्या यह दर्शाती नहीं है कि हमारी मानसिकतामें अत्यधिक परिवर्तनकी आवश्यकता है ? कोई चीनी, जापानी, यूरोपीय अंग्रेजीमें तो नहीं बोलता और उन्हें लज्जा भी नहीं नहीं आती है और हम उनका उपहास भी नही करते हैं तो भारतीयके लिए अंग्रेजीमें बोलना आवश्यक क्यों है ? क्या वह हमारी भाषा है, जिसे सभीको जानना ही चाहिए ? हम अंग्रेजोंकी दासतासे हम कब मुक्त होंगे ? हमारे जो खिलाडी, जिन्हें अंग्रेजी नहीं आती है, उन्हें इस बात कदापि लज्जित नहीं होना चाहिए कि उन्हें अंग्रेजी नहीं आती है और यदि कोई अंग्रेजीमें पूछे तो उन्हें अपनी भाषामें या हिन्दीमें ही उत्तर देना चाहिए । जिन्हें हमारी भाषा नहीं समझमें आती है, उन्होंने तलपट्टीमें अंग्रेजीमें उसका अनुवाद पढकर सन्तोष करना चाहिए ! ‘एथलेटिक्स फेडरेशन ऑफ इण्डिया’के इस कृत्यका हम निषेध करते हैं !
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