धर्मधारा


मेरा कार्य, किसीको मायामें लिप्त करना नहीं; अपितु ईश्वर अभिमुख करना है     
कुछ साधक स्वयं भी निष्काम साधना नहीं कर पाते हैं और अन्योंको भी नहीं करने देते हैं । एक साधकका प्रारब्ध तीव्र है, जिस कारण उन्हें किसी भी क्षेत्रमें यश नहीं मिल रहा है और ईश्वरके प्रति भी श्रद्धा अत्यल्प है; अतः भक्तिका भी उन्हें सहारा नहीं है ! उन्होंने एक अन्य साधकको जो निष्काम भावसे सेवा करते हैं उन्हें भ्रमित करने हेतु कहा कि तनुजा ठाकुरसे जुडनेवाले प्रत्येक साधककी सर्व इच्छापूर्ति कहां हुई है ? तो इस साधकके इस प्रसंगको लेकर मैं सभीको इस सन्दर्भमें तीन बातें बताना चाहुंगी, प्रथमतः मेरा कार्य किसी भी व्यक्तिको मायामें उलझाना नहीं है; अपितु मायासे निकालकर ईश्वरकी और उन्मुख करना है ! दूसरा यदि आपको अनिष्ट शक्तियोंके कारण कष्ट हो रहा है तो योग्य साधना करनेपर आपके कष्ट या तो समाप्त हो जाएंगे या उसकी तीव्रता न्यून हो जाएगी; परन्तु यदि आपके प्रारब्धमें कोई सुख नहीं है तो इसे पानेमें हेतु कुछ वर्ष श्रद्धा रख अखण्डतासे तीव्र साधना और सेवा करना होगी तत्पश्चात् ही ईश्वर आपके तीव्र प्रारब्धको न्यून करनेका या उसकी तीव्रता नष्ट करनेका नियोजन कर सकते हैं । दो महीने सेवा की और मेरे जीवनमें चमत्कार हो जाएगा, यह सम्भव नहीं ! तीसरी बात यह है कि मायाकी किसी भी इच्छाको पूर्ण करनेमें आपकी साधना व्यय होगी और आप उसी साधनाका उचित उपयोग यदि आध्यात्मिक प्रगति हेतु करते हैं तो आप शीघ्र अध्यात्मके अगले चरणमें चले जाएंगे, ऐसेमें मेरा प्रयास यही रहता है कि साधककी साधनाकी शक्तिका उचित सदुपयोग हो ! यदि किसी साधकमें भाव है और उसमें साधना कर आध्यात्मिक प्रगति करनेकी क्षमता हो तो उसे मायामें मैं कैसे अटका सकती हूं ?, मायामें आजतक किसीको शाश्वत सुख नहीं मिला है, जिस मायाको साधना कर पानेपर आपको सुख मिलेगा, वही पुनः एक दिवस आपके दुःखका कारण होगी, उसके विपरीत साधना करनेसे प्रारब्ध अनुसार जो नहीं मिला उसका दुःख भी नहीं होता और अध्यात्मके उत्तरोत्तर स्थिति साध्य करनेपर मन आनन्दित रहने लगता है !



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