८ मईसे ‘जागृत भव’ गुटकी एक युवा सदस्य सूक्ष्म इन्द्रियोंको जागृत करनेकी प्रक्रिया कर रही हैं, वैसे वह गत दो वर्षमें धर्मधारा सत्संग सुन रही हैं और कुछ तथ्योंको आचरणमें भी लानेका प्रयास कर रही हैं । इस सदस्यको ‘साधिका’ कहना अधिक उचित होगा; क्योंकि वे आध्यात्मिक तथ्योंको यथासम्भव आचरणमें भी लानेका प्रयास कर रही है और सूक्ष्म इन्द्रियोंको जागृत करनेकी प्रक्रियाने उसकी साधनाको निश्चित ही गति दी है; यद्यपि गत माह उनके दादाजीका देहान्त हो गया और उसकी साधनामें थोडे विघ्न भी आए; किन्तु अपनी तीव्र उत्कण्ठाके कारण वे उसमें यथासम्भव निरन्तरता बनाए रख पाई । दो दिवस पूर्व वे आश्रममें कुछ दिवस रहने आई हैं और मुझे उन्हें देखकर अत्यधिक आनन्द हुआ; मेरा सूक्ष्म परीक्षण कहता है कि दो वर्ष पूर्वतक उनके ऊपर ५० फीटका काला आवरण था और उसकी पुष्टि करते हुए वे स्वयं कह रही हैं कि उनमें अनिष्ट शक्ति प्रकट होती थी । जब वे धर्मधारा सत्संगमें बताए अनुसार सामूहिक नामजप करती थी; किन्तु अब वह काला आवरण नष्ट होकर, उनका वलय, मात्र कुछ माहके प्रयासोंसे सकारात्मक हो गया है । वैसे उनके घरमें भी तीव्र पितृदोष है (आज ७०% घरोंमें तीव्र पितृदोष है) और अनिष्ट शक्तियोंका भी कष्ट है; किन्तु वे धर्मधारा सत्संग अनुसार साधना करनेका प्रयास करती रहती हैं और उसे साधनामें आनेवाली अडचनोंके विषयमें जिसे वे आश्रमके साधकोंसे समय-समयपर साझा कर, मार्गदर्शन लेती रही हैं । उनका सकारात्मक वलय ६ मीटरके लगभग है, इस प्रयोगमें ‘यू.टी.एस.’ (युनिवर्सल थर्मो स्कैनर) उपकरणसे इनका प्रभामण्डल मापा गया है । सर्वसामान्य व्यक्तिका प्रभामण्डल (जिन्हें अनिष्ट शक्तियोंका कष्ट न हो), एक मीटर होता ही है ।
{यू.टी.एस. उपकरणसे घटक वस्तुका प्रभामण्डल मापन : प्रभामण्डल मापनेके लिए उस घटक वस्तुके सर्वाधिक स्पन्दनवाले प्रादर्शका (नमूनेका) उपयोग किया जाता है; उदा. व्यक्तिके विषयमें उसकी लार अथवा छायाचित्र, वस्तुके विषयमें उसका छायाचित्र, वनस्पतिके विषयमें उसका पत्ता, मनुष्येतर प्राणियोंके विषयमें उनके बाल, भवनके विषयमें वहांकी मिट्टी या धूल और देवताकी मूर्तिके विषयमें उसे लगा हुआ चन्दन, कुमकुम, सिन्दूर इत्यादि ।
इस परीक्षणमें व्यक्तिका प्रभामण्डल मापनेके लिए उनके लारका उपयोग किया गया था ।
(‘यू.टी.एस.’ उपकरणकी अधिक जानकारीहेतु देखें:
www.vedicauraenergy.com/universal_scanner.html )
यह आपको इसलिए बता रही हूं; क्योंकि ईश्वर सम्भवतः मुझे और सभीको यह बताना चाह रहे हैं कि हमारी प्रक्रिया कितनी वैज्ञानिक है और यह सर्व सामान्य व्यक्ति भी इसे सहजतासे कर सकता है; मात्र समय और दृढ संकल्पकी आवश्यकता होती है । वस्तुतः ईश्वरीय तत्त्वके हमारे भीतर विराजमान होनेके कारण हम सब मूलतः स्वयंप्रकाशी हैं; मात्र आत्माके ऊपर मन, बुद्धि और अहंका मोटा आवरण हमें ईश्वरीय तत्त्वके अनुसन्धानसे दूर करता है और सूक्ष्म इन्द्रियोंको जागृत करनेकी प्रकियामें हम उस आवरणको मात्र नष्ट करना सिखाते हैं । वे सात दिवस आश्रममें रहेंगी, आश्रममें भावके साथ रहने और सेवा करनेसे सात दिवसमें ही उनके वलयमें कितना अन्तर आता है, वह भी आपको अगले लेखमें बताएंगे !
हमारे श्रीगुरुके श्रीचरणोंमें कोटिशः कृतज्ञता, जिन्होंने स्थूल और सूक्ष्म माध्यमोंसे मुझे यह ज्ञान दिया और आज समाजको सिखानेकी प्रेरणा दे रहे हैं ! मुझे यह लेख लिखते हुए बहुत आनन्द हो रहा है और इस क्रममें मुझपर जितने सूक्ष्म आघात और कष्ट हुए वह सब इस परिणामके सामने नगण्य लग रहे है, वैसे ही जैसे नवजात बच्चेका मुख देखकर, जननी अपनी प्रसव पीडा और गर्भावस्थाके मध्य हुए कष्टको भूल जाती है ! जैसे एक माताको अपने बच्चेको बडे होते देख आनन्द होता है, वैसा ही आनन्द मुझे ऐसे लोगोंके सूक्ष्म काले आवरणको नष्ट होते देख हो रहा है ! यह ईश्वरद्वारा हमारे इस उपक्रमको दिया गया एक प्रमाणपत्र ही है; अतः उनके चरणोंमें नमन है । वैदिक सनातन धर्मकी इस लुप्तप्राय विधाको समाजको सिखा सकूं, इस हेतु वे हमें आवश्यक भक्ति, शक्ति और ज्ञान देते रहें और हम उनकी सेवा करते रहें, यह उनके श्रीचरणोंमें प्रार्थना है । ये साधक सूक्ष्म स्तरपर कार्य करनेवाले धर्मसैनिक और धर्मरक्षक बन समाज और राष्ट्रका आगामी आपातकालमें सहायता करें, यह हमारे इस उपक्रमका उद्देश्य है ! – तनुजा ठाकुर
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