धर्मधारा


भगवद्भक्ति करने हेतु निश्छल प्रेमके अतिरिक्त और कुछ भी आवश्यक नहीं । भक्ति सभी कर सकते हैं, यह सर्व प्राणी मात्रके लिए सहज ही प्राप्य है एवं निष्काम भक्तिसे प्रसन्न होकर भक्तवत्सल भगवानने अपने भक्तोंका बिना किसी देश, काल, लिंग, जाति, वर्ण आदिके भेदभावके उद्धार किया है, इतिहास इसका साक्षी है । श्रीमद्भागवतमें कहा गया है –
नालं द्विजत्वं देवत्वमृषित्वं वासुरात्मजाः ।
प्रीणनाय मुकुन्दस्य न वृत्तं न बहुज्ञता ॥
न दानं न तपो नेज्या न शौचं न व्रतानि च ।
प्रीयतेऽमलया भक्त्या हरिरन्यद् विडम्बनम् ॥
दैतेया यक्षरक्षांसि स्त्रियः शूद्रा वजौकसः ।
खगा मृगाः पापजीवाः सन्ति ह्यच्युततां गताः ॥
अर्थात भगवानको प्रसन्न करनेके लिए केवल ब्राह्मण, देवता या ऋषि होना, सदाचार और विविध ज्ञानोंसे सम्पन्न होना तथा दान, तप, यज्ञ, शारीरिक और मानसिक शौच और बडे-बडे व्रतोंका अनुष्ठान ही पर्याप्त नहीं है । भगवान केवल निष्काम प्रेम-भक्तिसे ही प्रसन्न होते हैं और सब तो विडम्बना मात्र है ! भगवानकी भक्तिके प्रभावसे दैत्य, यक्ष, राक्षस, स्त्री, शूद्र, गोपालक, अहीर, पक्षी, मृग और बहुत-से पापी जीव भी भगवद्भावको प्राप्त हो गए हैं । – तनुजा ठाकुर



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