धर्मधारा


जैसे-जैसे आपातकाल निकट आ रहा है, प्रकृतिका भी कोप सर्वत्र स्पष्ट देखा जा सकता है । इस बारकी वर्षा, सर्वत्र अपने कुपित स्वरुपसे भयभीत कर रही है । जिस समाजमें देवी-देवताओंकी व सन्तोंकी विडम्बना हो, नित्य स्त्रियोंके शीलका हरण हो, तमोगुणका साम्राज्य बढता जाए एवं स्वर्थान्धोंका राज हो, वहां प्रकृतिका कुपित होना स्वाभाविक है ।



Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

सम्बन्धित लेख


© 2017. Vedic Upasna. All rights reserved. Origin IT Solution