ऐसे कुछ आध्यात्मिक दृष्टिसे प्रगत साधकसे मिली हूं जो मेरे पास ईश्वरको पानेकी इच्छासे फूट फूट कर रोये हैं और मैंने पाया कि, उन्हें ईश्वरको पानेकी तडप तो है; परंतु उनके प्रयास उस दिशामें नहीं होते हैं, कुछ भावनाओंमें अटक जाते हैं, कुछ अहंकारमें, कुछ लोकैषणामें, कुछ सुनते तो संतोंको बडे प्रेमसे हैं परंतु करते अपने मनकी ही हैं अतः वे अध्यात्ममें जहां होते हैं वहीं रह जाते हैं ! यदि दूधसे घी निकालना है तो दूधपर एक विधिवत प्रक्रिया करनी पडती है जो कष्टप्रद होता है, उसी प्रकार ईश्वरको मात्र पाने हेतु रोते रहनेसे ईश्वर नहीं मिलते, उनके संकेतको समझ कर अपने ऊपर प्रक्रिया करनी होती है तभी अध्यात्मके आगे-आगेके चरणको साध्य करना संभव होता है – तनुजा ठाकुर (२९.८.२०१३)
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