साधकका एक गुण है अर्पणकी हुई वस्तुका विचार न करनेवाला होना


अनेक भक्त जब किसी संत या अपने ज्येष्ठ साधकको कुछ वस्तु अर्पण करते हैं तो उन्हें यह अपेक्षा होती है कि वे उसे स्वयं उपयोग करे। हम अर्पण क्यों करते हैं ? अर्पण करनेसे उस वस्तुके प्रति हमारी आसक्ति नष्ट हो, इस हेतुसे हम कुछ अर्पण करते हैं । जब हमने किसीको कुछ अर्पण किया और यह विचार कर सोचते रहें कि उन्होंने उस वस्तुका उपयोग कैसे किया होगा या जिसे दिया उन्होंने स्वयं उसका उपयोग किया होगा या नहीं तो हमारी आसक्ति नष्ट नहीं होती । जब मंदिर में दस रुपए दानपेटीमें डालते हैं तो यह नहीं सोचते कि उस दस रुपएसे मंदिरमें क्या लाया गया होगा अतः उसे अर्पण कहते हैं ।

इस संदर्भमें एक रोचक संस्मरण आपसे साझा करती हूं

ख्रिस्ताब्द २००१ में मैं कानपुर , लखनऊ , सुल्तानपुर, प्रयाग और प्रतापगढ उत्तर प्रदेशके इन पांच जिलोंमें धर्म प्रसारकी सेवा किया करती थी । उसी वर्ष मुझे सर्दियोंमें अत्यधिक खांसी हो गयी और उसी स्थितिमें मैं कानपुर पहुंची।  वहां एक साधकके घर रहती थी जिनका संयुक्त परिवार था।  मुझे खांसता देख घरकी माताजीने मुझे एक गलेमें बांधनेवाला एक ऊनी गलबंध (स्कार्फ) दी और मुझसे  कहा, “इसे मैं चंडीगढसे लेकर आई हूं किसीको देना नहीं, स्वयं बांधना, सर्दियोंमें ईधर-ऊधर घूमती हो इसलिए खांसी छूटती नहीं, इससे पूरे गलेको ठंडसे सुरक्षा मिलेगी” । वह गलबंध सचमुच कुछ भिन्न था, कान और गले दोनों ही पूरी तरहसे ढक जाते थे । मैंने पहले तो मना किया किन्तु जब वे हठ करने लगी तो मैंने उसे स्वीकार कर लिया और उनके सामने उसे धारण कर लिया । उन्हें मैं मां कहती थी, वे मुझसे अत्यधिक स्नेह करती थी, वैसे स्वभावसे कडक थीं परंतु मेरे प्रति उनका व्यवहार अत्यधिक स्नेहसे भरा रहता था । वैसे तो अपनी बहुओंको साधना करनेके लिया मना करती थी परन्तु मुझसे अत्यधिक प्रेम करती थी, उनका यह व्यवहार थोडा विचित्र तो था क्योंकि उन्हें अनिष्ट शक्तियोंका कष्ट था इसलिए वे अपने बहुओंका साधनामें विरोध करती थीं परंतु मुझमें उन्हें कुछ विरोध करने लायक दिखता नहीं था अतः वे मुझसे स्नेह करती थीं, अपने साथ ही सुलातीं भी थीं । उन्हें जैसे ही पता चला था कि मुझे फल अत्यधिक प्रिय हैं तो वे, जिस दिन मैं कानपुर आनेवाली होती उस दिन स्वयं बाजार जाकर मेरे रुचि अनुसार फल लातीं, उसे प्रेमसे काटकर मेरी राह देखती।  उनकी बहुएंं उनकी इस व्यवहारपर अंदर ही अंदर हंसती थीं । मैं जब भी किसी औरके घर सत्संग लेती तो वे पहलेसे ही कोई  बहाना बनाकर कलह कर देती और जिस कारण उनकी दोनों बहुएंं चाहकर भी सत्संगमें नहीं जा पातीं । अतः मैं उनके घरपर ही सत्संग किया करती थी जिसमें वे भी उपस्थित रहती यद्यपि कुछ समयमें ही सत्संगमें सो जाया करती थीं। जिन्हें आध्यात्मिक कष्ट होता है वे सत्संगके चैतन्यको न सहन कर पानेके कारण सो जाते हैं ।

जिस सप्ताह उन्होंने मुझे गलबंध दी थी उसी सप्ताह मुझे प्रयाग जाना पडा और वहां एक महाराष्ट्रसे आए साधकको अत्यधिक खांसी होता देख मैंने वह गलबंध उन्हें दे दिया क्योंकि वे आर्थिक दृष्टिसे भी उतनी सक्षम भी नहीं थीं और उन्हें उत्तर भारतकी सर्दी सहन नहीं हो रही थी । अगले सप्ताह जब मैं पुनः कानपुर पहुंची तो मेरी खांसी वैसी ही थी । अनिष्ट शक्तियोंने मुझे बचपनसे ही गलेमें अत्यधिक कष्ट दिया है । माताजीने मेरे गलेमें एक अन्य रेशमी गलबंध गलेमें देख मुझसे पूछ बैठीं, “मैंने जो गलबंध दिया था वह कहां है ?” उनके क्रोधी स्वभावसे मैं परिचित थी और मैं झूठ भी नहीं बोलना चाहती थी अतः मैं चुपचाप शांत रही कुछ न बोली, वे बोलने लगीं “ अच्छेसे जानती हूं तुम्हें, दानी राजा हो तुमने अवश्य किसीको दे दिया होगा, ये भी न सोचा कि मैंने तुम्हें दिया था और तुम्हें उसकी आवश्यकता थी । मुझे पता होता कि तुम किसी और को दे दोगी तो मैं तुम्हें उसे कभी न देती । मैंने अपनी पोतियोंको नहीं दिया और तुम्हें खांसते देख दे दिया और तुमने उसे एक सप्ताह भी नहीं पहना, किसी औरको दे दिया ”  वे मेरी इस धृष्टतासे क्रोधित हो गयी थीं । मैं चुपचाप मुंह नीचे कर उनकी डांट सुनती रही । यह तो मुझे पता था कि वह उनका प्रेम था परंतु मैं उन्हें यह न बता पायी कि मुझसे अधिक उसकी आवश्यकता किसी और को थी उन्होंने मुझसे कहा कि अगले सप्ताह मुझे वह गलबंध तुम्हारे गलेमें चाहिए । मैंने हामी भरी और उनका क्रोध थोडा शांत हुआ । उसी दिन मैंने सत्संगमें यह मुद्दा लिया कि अर्पण किये हुए वस्तुका विचार न करनेवाला शिष्य कहलाता है परंतु उन्हें मेरे इस विषयमें कोई रुचि नहीं लगी ! अगले सप्ताह प्रयाग गयी और वह साधक मुझे कृतज्ञता व्यक्त करने लगी क्योंकि उनकी खांसी कम हो गयी थी मैं उनसे संकोचसे गलबंध न मांग पाई । पुनः कानपुर पहुंचनेपर माताजीने गलबंधके बारेमें पूछा, मैंने उन्हें डरते-डरते बता दिया कि मैंने उसे किसी और साधकको दे दिया है, वे मुझसे मुंह फेर कर बैठ गईं । मैंने उन्हें किसी प्रकार मनाया और उनसे क्षमा मांगी । जब मैं उस सप्ताह उनके घरसे जाने लगी तो वे पुनः अपने लिए रखा वैसा ही एक और गलबंध निकाल कर मेरे गले डाल दिया और बोलीं “ इस बार किसीको देना मत “ ! मैंने उन्हें मना किया परंतु वे मानी नहीं, उनके प्रेमको मैं मना न  कर पायी और मैंने आज तक डरसे उसे संभाल कर रखा है !  उनका पिछले वर्ष देहावसान हो गया और जब मुझ तक उनकी मृत्युकी बात पहुंची तो मुझे उनका प्रेम और उनकी डांट दोनोंका ही स्मरण हो गया -तनुजा ठाकुर

 



Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

सम्बन्धित लेख


विडियो

© 2021. Vedic Upasna. All rights reserved. Origin IT Solution