साधना करनेपर उसके तुरन्त परिणाम अनेक बार दिखाई नहीं देते, ऐसेमें धैर्य धारण करना आवश्यक है । साधनाके आरम्भिक कालमें, साधनासे उत्पन्न शक्ति हमारे दोष और संचितको नष्ट करनेमें तीव्र प्रमाणमें व्यय हो जाती है ! साधना करते रहनेसे धीरे-धीरे हमारी अन्तर्मुखता बढती है और हम अपने दोषोंको अल्प (कम) करनेका प्रयास करने लगते हैं और साथ ही संचित कर्मोंके फलकी तीव्रता न्यून (कम) होनेपर साधनाका परिणाम स्पष्ट रूपसे दिखने लगता है ! इस प्रकारके परिणामकी परिणतिमें कभी-कभी अनेक वर्ष और कभी-कभी अनेक जन्म भी लग जाते हैं; परन्तु साधनाका परिणाम निश्चित ही मिलता है !
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