पिछले वर्ष एक तीर्थ नगरी में गंगा तटपर एक अत्यधिक प्रसिद्ध संतके आश्रममें जानेकी संधि मिली । आश्रम क्या था विदेशियोंको आकृष्ट करने हेतु भरितीय संस्कृतिकी झलक देनेवाली एक तामझाम युक्त दुकान थी। आश्रमका इस परिसीमा तक व्यापरीकरण हो गया था कि वहां घुसते ही मेरे सिरमें वेदना होने लगी। मन यह सब देख क्रंदन करने लगा ! ऐसे आश्रमको यदि गंगा मैया लील जाये तो आश्चर्य कैसा ! आश्रमके साधक मुझे अपने आश्रमकी ऊपरी दिखावाटसे मुझे प्रभावित करने का कोई प्रयास नहीं चूक रहे थे मुझे उनकी salesmanship देखकर तरस आ रहा था ! यदि ऐसे तथाकथित संत थोडा ध्यान अपनी साधनापर दें तो सम्पूर्ण विश्वसे उनके यहां भक्त स्वतः ही आकृष्ट हो जाएंगे ! और इस बारके महाकुंभमें भी उनके शिविरसे व्यापरिकरणकी दुर्गंध आ रही थी -तनुजा ठाकुर
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