स्वभाषाभिमान


यूरोप धर्मयात्राके मध्य मैंने पाया कि वहांके लोगोंमें स्वभाषाभिमान कूट-कूट कर भरा हुआ है । वहां अंग्रेजी भाषाको लोग निकृष्ट दृष्टिसे देखते हैं और अपनी भाषा बोलनेमें गर्व अनुभव करते हैं । वहीं स्वभाषाभिमान रहित भारतीय हिन्दू जो वहां रह रहे हैं, वे अपनी सन्तानोंको अपनी भाषा बोलना, पढना और लिखना नहीं सिखा पाते हैं और तो और, वे अपनी सन्तानोंको यूरोपीय भाषामें बोलते देख गर्व अनुभव करते हैं ! यह भेद हैं भारतीय हिन्दुओं और यूरोपीय लोगोंके भाषाप्रेममें  -तनुजा ठाकुर



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