अंग्रेजी नववर्ष क्यों नहीं मनाना चाहिए ?


नववर्ष प्रारम्भ जैसा कि नामसे ही सिद्ध होता है उसका अर्थ है नूतन वर्षका शुभारम्भ; किन्तु प्रतिवर्ष १ जनवरीको पाश्चात्य संस्कृतिसे प्रभावित लोगोंद्वारा मनाया जानेवाला तथाकथित नववर्ष इसके विपरीत प्रतीत होता है; क्योंकि इसमें नूतन कुछ नहीं होता । आध्यात्मिकताविहीन तथा केवल भौतिकताके विकृत प्रदर्शनका प्रतीक बन चुके, इस दिवसको उत्सवके रूपमें मनाना पूर्णतः अनुचित है । बात केवल एक पर्व मनानेकी नहीं है, हमारी विचार प्रक्रियाकी तथा स्वाभिमानकी है । अन्य संस्कृतियोंके सुग्राह्य तथ्योंको हमारी संस्कृतिने सदैव आत्मसात् किया है; किन्तु धर्माभिमान एवं अध्यात्मकी योग्यरीतिसे शिक्षा नहीं दिए जानेके कारण अधिकांश जन्म हिन्दुओंका अति उदार होनेका दुष्परिणाम सांस्कृतिक पतनके रूपमें हुआ है | हम अपनी दैवी संस्कृतिको भूलते जा रहे हैं; फलस्वरूप अनेक प्रकारकी समस्याओंसे आजका हिन्दू समाज पीडित है । अपनी संस्कृतिसे विमुख होनेका ही परिणाम है कुटुम्ब व्यवस्थाका टूटना, वैवाहिक सम्बन्धोंमें कलह-क्लेशका होना, स्वार्थी होना, वृद्धाश्रमोंका निर्माण होना, युवा वर्गका व्यभिचारी होना, समाजका भ्रष्टाचारी होना, राज्यकर्ताओंके राष्ट्र एवं धर्मके प्रति नैतिक उत्तरदायित्त्वोंका निर्वाह न करना जैसी समस्याएं आज धर्म और संस्कृतिसे विमुख होनेका ही परिणाम है |
पाश्चात्योंको अपना आदर्श माननेकी कारण आज अधिकांश हिन्दू माता-पिता अपनी सन्तानोंको विदेशी अंग्रेजी भाषामें शिक्षित करनेमें गर्व अनुभव करते हैं, तभी तो आजके अंग्रेजी माध्यममें पढनेवाले अधिकांश विद्यार्थियोंको अपनी धर्म और संस्कृतिके प्रति अभिमान नहीं है और ये तथ्य गर्व करने योग्य नहीं; अपितु लज्जास्पद है, इसका भी उन्हें बोध नहीं होता | ऐसे संस्कारोंमें पली सन्तानें विदेशियोंका अनुकरण कर यदि अपने वृद्ध माता-पिताको त्याग, विदेशियों समान बिना विवाह किए पति-पत्नी समान रह रहे हों अर्थात् ‘लिव इन रिलेशनशिप’का अनुसरण कर रहे हों या विदेशियों समान अपने पालकोंको वृद्धाश्रममें छोड देते हों तो इसमें आश्चर्य कैसा ? इसी विदेशी संस्कृतिसे वशीभूत होकर आज अनेक हिन्दू १ जनवरीको नये वर्षके रूपमें मनाते हैं ।

प्रत्येक तथ्यको तर्ककी कसौटीपर प्रमाणित कर स्वीकार करनेवाली यह आधुनिक पीढी, बिना सोचे-विचारे अंग्रेजी नववर्षको उत्सवके रूपमें मनाती है | वस्तुतः हमारे देशमें प्रत्येक पर्व अथवा उत्सवको मनानेका कोई न कोई आधारभूत आध्यात्मिक कारण अवश्य है; किन्तु १ जनवरीको नववर्ष मनानेका कोई भी आध्यात्मिक या शास्त्रीय कारण उपलब्ध नहीं है । जो लोग ३१ दिसम्बरकी रात्रि १२ बजे उपरान्त नये वर्षका प्रारम्भ मानते हैं, वे क्या इस प्रश्नका उत्तर देंगे कि ‘दिवस’का प्रारम्भ ‘मध्यरात्रि’में कैसे हो सकता है; क्योंकि दिन तो सूर्योदयके समय प्रारम्भ होता है, रात्रिमें नहीं ! रात्रिमें तो केवल घडीका समय परिवर्तित होता है । पाश्चात्य संस्कृति अनुसार वर्षारम्भ मनानेवाले वर्तमानकालको २१वीं शताब्दी कहते हैं, यदि उनकी मानें तो मानवका इतिहास केवल २०१६ वर्षोंका ही है और यदि यह २१वीं शताब्दी है तो क्या इसके पूर्व मानव सभ्यता नहीं थी ?

पाश्चात्य सभ्यताका अन्धानुकरण करनेवाले क्या यह नहीं जानते कि पाश्चात्योंने हमारे भारतीय काल-गणना तन्त्र एवं पंचांगको (कैलेण्डर) तोड-मडोड कर स्वीकार किया है | ख्रिस्ताब्द १७५२ के पूर्व सितम्बर, अक्टूबर, नवम्बर और दिसम्बर माह ‘अंग्रेज़ी कैलेण्डर’ का क्रमशः सातवां, आठवां, नौवां तथा दसवां माह ही होता था जबकि अब ऐसा नहीं है । हिन्दीमें सातको सप्त, आठको अष्ट कहा जाता है, इसे अंग्रेजीमें sept (सेप्ट) तथा oct (ओक्ट) कहा जाता है । इसीसे september तथा October  बना । नवम्बरमें तो सीधे-सीधे हिन्दीके “नव”को ले लिया गया है तथा दस अंग्रेजीमें “Dec” बन जाता है जिससे December बन गया । ऐसा इसलिए कि ख्रिस्ताब्द १७५२ के पूर्व दिसम्बर दसवां महीना ही हुआ करता था । इसका एक प्रमाण और है । किंचित् विचार कीजिए कि २५ दिसम्बर अर्थात् क्रिसमसको X-mas क्यों कहा जाता है ? इसका उत्तर ये है कि “X” रोमन लिपिमें दसका प्रतीक है और mas शब्द माससे आया है अर्थात माह । दिसम्बर दसवां माह हुआ करता था इसलिए २५ दिसम्बर दसवां महीना अर्थात् X-masसे प्रचलित हो गया; किन्तु जुलियस सीजरने ४५ ईसा पूर्व स्वयंका ‘कैलेण्डर’ बना दिया और १ जनवरीको नववर्षके रूपमें मानना प्रारम्भ कर दिया, ऐसा करनेके लिए उसे प्रथम वर्ष ४४५ दिवसका करना पडा । है न अशास्त्रीय एवं हास्यास्पद तथ्य ! साथ ही एक जनवरी वह दिन भी है जब ‘यीशु’की धार्मिक विधि (खतना) हई थी, जिसे रोमन, कैथोलिक चर्च आदिमें एक त्योहारकी भांति आज भी मनाया जाता है तो इस कारण भी पाश्चात्य नववर्षको १ जनवरीको मनानेपर सहमत हो गए; अतः कोई भी स्वाभिमानी भारतीय मन-मस्तिष्क १ जनवरीको नववर्ष हो, इस तथ्यको कभी स्वीकार नहीं कर सकता और जो स्वीकार कर रहा है वह कितना बुद्धिमान है ? यह वह स्वयं विचार करें ! ऐसेमें जब आज भी हमारी संस्कृति ही महान है और यह प्रमाणित है तो पाश्चात्य संस्कृतिका अनुकरण मानसिक दिवालियेपनका प्रतीक नहीं तो और क्या है ?

हमारे यहां कहा गया कि दिन देवताओंका और रात्रि राक्षसोंकी होती है । इस दृष्टिसे रात्रिमें इसप्रकार रात्रिमें उत्सव मनाना अनिष्ट शक्तियोंको हमारे जीवनमें कष्ट देने हेतु आमन्त्रण देना नहीं है क्या ? रात्रि १२ बजे पश्चात् ‘डीजे’के कर्णकर्कश कोलाहलपर, मद्यपानकर, विकृत नृत्यके साथ वर्षका प्रारम्भ करना उचित है क्या ? तमोगुणी वातावरणमें कथित वर्षारम्भसे लाभ नहीं; अपितु केवल हानि ही होती है ।

भारतीय संवत्सरमें महीनोंके नाम वैज्ञानिक रीतिसे, आकाशीय नक्षत्रोंके उदय-अस्त होनेके अधारपर रखे गए थे । भारतीय नववर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदापर मनाया जाता है, जब आकाशके सभी ग्रह-नक्षत्र पृथ्वीपर अपनी कृपादृष्टि डालते हैं । नववर्ष प्रतिपदाको स्वयंसिद्ध मुहूर्तोंमेंसे एक माना जाता है इसी कारण इस दिन कोई भी शुभकार्य बिना मुहूर्त देखे प्रारम्भ किया जा सकता है, जबकि अन्य दिनोंमें कार्य विशेषके लिए मुहूर्त निकाला जाता है । अब तो पाश्चात्य विद्वान भी ग्रहोंके प्रभावको स्वीकार कर चुके हैं । भारतीय नववर्ष तब मनाया जाता है, जब प्रकृतिमें नवचेतना आनी प्रारम्भ होती है । हमारा भारतीय नववर्ष रात्रिके बारह बजे नहीं; अपितु सूर्योदयसे मनाया जाता है । जब अन्धकार समाप्त होता है और प्रकाश फैलता है । इसी दिन ब्रह्माजीने सृष्टिकी रचना की थी और इसी दिन हमारी पृथ्वीका जन्म हुआ था । भारतीय नववर्ष तब आता है, जब ऋतुएं अनुकूल होती हैं । इस सब तथ्योंसे स्पष्ट है कि अंग्रेजी नववर्षका प्रकृति और ब्रह्माण्डसे कोई सम्बन्ध नहीं है, जबकि भारतीय नववर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा ज्योतिषके अनुसार वैज्ञानिक और आध्यात्मिक तथ्योंके अनुसार और प्रकृति चक्रके अनुसार मनाया जाता है । सूक्ष्मतासे विचार करें तो हमारी संस्कृतिमें उत्सव मनानेकी प्रत्येक क्रियाके पीछे समस्त भूमण्डलका हित समाहित है ।

वर्तमान समयमें जब सम्पूर्ण विश्व आध्यात्मिक मार्गदर्शन तथा विश्वशान्तिके लिए भारतकी ओर आशाभरी दृष्टिसे देख रहा है, ऐसेमें हिन्दुओंका इसप्रकारका पाश्चात्योंका उत्सव मनाना न केवल अनुचित है; अपितु पाप भी है; अतः हमारी भावी पीढी तथा व्यापक राष्ट्रहितको दृष्टिगत रखते हुए १ जनवरीको मनाए जानेवाले नववर्षका बहिष्कार सर्वथा उचित है ।



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