धर्मधारा


आजकल माता-पिता बच्चोंमें स्वाध्यायके या व्यक्तित्व विकासके संस्कार निर्माण ही नहीं करते हैं, बच्चे विद्यालय जाते हैं उसके पश्चात् उन्हें ‘ट्यूशन’ या ‘कोचिंग’ भेज दिया जाता है । मैंने देखा है इसलिए आजकलके बच्चोंमें विद्यालयीन शिक्षासे अर्जित ज्ञानको आत्मसात करना नहीं आता । उनमें सामान्य ज्ञानकी बहुत कमी होती है, वे मात्र अंक लाने हेतु विषयको समझते हैं और अंक लाकर धन अर्जित करने हेतु भिन्न प्रकारकी प्रतिस्पर्धात्मक परीक्षाएं देते हैं और उसमें उत्तीर्ण होकर बडे पदपर आसीन हो जाते हैं किन्तु जीवनकी मौलिक बातोंका ऐसे उच्च शिक्षितको ज्ञान नहीं  होता । यह मैं क्यों कह रही हूं; क्योंकि उपासनाके आश्रममें देश-विदेशसे युवा वर्गके जिज्ञासु आते रहते हैं और उनके आचरणसे मुझे अत्यधिक आश्चर्य होता है और प्रश्न उठता है कि क्या इन्हें शिक्षित होनेकी उपमा दी जानी चाहिए, इसके कुछ उदाहरण बताती हूं –
१. जैसे कोई आया तो उन्हें जल पूछना चाहिए, यह गुण भी अनेक युवाओंमें दिखाई नहीं देता है ।
२. हमसे कोई अधिक आयुके व्यक्ति आए हैं और हमें कुछ बता रहे हैं तो हमें उठकर खडे होकर उनकी बातें सुनकर लेना चाहिए या उन्हें बैठने हेतु आसन्दी देनी चाहिए, यह व्यावहारिक संस्कार भी अधिकांश युवाओंमें दिखाई नहीं देता है ।
३. कहींपर कुछ अस्वच्छता है तो उसे स्वच्छ करना चाहिए, यह अनेक दिवस दिखाई देते हुए उसे स्वच्छ करनेकी वृत्ति नहीं होती है ।
४. एक विज्ञान शाखामें उच्च शिक्षा ग्रहण कर रहे युवाने ‘हॉट केस’में ही रखी हुई दालको प्रशीतक (फ्रिजमें) रख दिया, जिससे वह पांच घण्टे पश्चात दूषित (खराब) हो गई !
५. जो वस्त्र पहनते हैं, उसमें वे ऐसे कैसे लग रहे है ?, इसका भी उन्हें भान नहीं होता ! क्या उस वस्त्रको पहनकर हम अमुक स्थानपर जा सकते हैं । जैसे एक युवा लडकी अत्यधिक तंग और बिना बांहके वस्त्र पहनकर सत्संगमें आई थी, जबकि वह स्नातककी छात्रा है और कहीं चाकरी भी करती है ! अनके युवा जब आश्रममें टी-शर्ट पहनकर आते हैं तो उसमें क्या लिखा है ?, वह पहनकर जा सकते हैं क्या ?, यह भी वे नहीं देखते हैं !
६. दूसरोंका विचार यह गुण तो जैसे इस पीढीमें है ही नहीं, वे इतने स्वार्थी होते हैं कि उनकी इस वृत्तिके विषयमें बतानेमें भी संकोच होता है । वे मात्र अपना विचार करते हैं, इसकारण उनके साथ रहनेवालोंको उनसे बहुत कष्ट होता है !
७. सात्त्विकता शब्दसे तो जैसे उनका कोई लेना-देना ही नहीं है और धैर्य तो है ही नहीं, जैसे एक आश्रममें रह रहे कार्यकर्तासे जब मैंने कहा कि आपके प्रयास योग्य दिशामें नहीं हो रहे हैं, ऐसेमें तो पन्द्रह वर्षमें भी आप आश्रममें रहकर जीवनमुक्त नहीं हो सकते हैं तो उन्होंने कहा, “मैं तो एकसे दो वर्षमें जीवनमुक्त होना चाहता हूं । इतने वर्ष तो मैं प्रतीक्षा नहीं कर सकता !”
८. विनम्रता तो जैसी इस पीढीमें है ही नहीं, वे न ही चूक स्वीकार  करना चाहते हैं और न ही किसीके अनुशासनमें रहकर कुछ करना चाहते हैं ! कोई चूक बताई जाए तो त्वरित उसका स्पष्टीकरण देकर वे कैसे सही हैं?, यह सिद्ध करना चाहते हैं ।
९. किसी भी समस्याका समाधान ढूंढना तो जैसे आता ही नहीं है और आलस्यने तो इस पीढीको अल्पायुमें ही शारीरिक रूपसे इतना दुर्बल बना दिया है कि उसे शब्दोंमें व्यक्त नहीं किया जा सकता है ।
१०. वृत्तिसे ये भोगी हैं अर्थात इन्हें मात्र भोग करनेकी कला आती है !
आजकी पीढीमें समयबद्धता, स्वच्छता, नियोजनकुशलता, व्यवस्थितता, निष्काम प्रेम, त्याग इन गुणोंका सर्वथा अभाव दिखाई देता है, इससे समझमें आता है कि आजकी शिक्षण पद्धति मात्र धन अर्जित करनेवाले विवेकहीन, नीतिशून्य मनुष्य निर्माण कर रही है। इसलिए हिन्दू राष्ट्रमें विद्यार्थियोंमें सद्गुणोंकी वृद्धि और दुर्गुणोंको दूर करनेपर विशेष बल दिया जाएगा !
आजके माता-पितासे भी अनुरोध है कि अपने बच्चोंको धन अर्जित करने हेतु अवश्य शिक्षा दिलाएं; किन्तु साथ ही वह एक अच्छे व्यक्ति बनें, जिससे समाज और राष्ट्र लाभान्वित हो, ऐसे गुण भी अवश्य आत्मसात करवाएं |



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