कुछ समय पूर्व उपासनाके आश्रममें एक गृहस्थ अपनी युवा पुत्रीको लेकर आए थे। उनकी पुत्री बहुत ही सात्त्विक एवं उच्च अध्यात्मिक स्तरकी हैं। मैंने उनसे कहा, “आपकी पुत्री बहुत सात्त्विक एवं उच्च आध्यात्मिक स्तरकी है, वह सेवाके स्तरकी साधिका है अतः उसे अध्य्यनके साथ ही संगणकसे सम्बंधित धर्मप्रसारकी सेवा भी करने दिया करें।” उनकी पुत्रीको भी सेवा करनेकी बहुत इच्छा थी, वह नियमित धर्मधारा सत्संग भी सुनती है। मात्र इतना ही बताया कि वे दम्पति डर गए कि मैं, उनकी पुत्रीको पूर्णकालिक साधक बना दूंगी और उसके पश्चात् वे अपनी पुत्रीको कभी आश्रम लेकर नहीं आते हैं और पूछनेपर झूठे बहाने बनाते हैं। यह तो मैंने एक प्रकरण बताया है, ऐसे अनेक प्रकरण मैंने अनुभव किए हैं, जब माता-पिता अपनी ऐसी संतानोंको जो साधना हेतु इच्छुक होते हैं, उन्हें साधना और सेवासे दूर रखते हैं क्योंकि उन्हें डर होता है कि उनकी सन्तानें पूर्ण समय साधना न करने लगें। आज उत्तर भारतमें अधिकांश घरोंमें पितृ दोष एवं अनिष्ट शक्तियोंका कष्ट है, ऐसेमें यदि कोई भी जीवात्मा जो बहुत सत्त्त्विक हो या उच्च आध्यात्मिक स्तरपर हो तो उसे कालानुसार अधिक कष्ट होता है।
कुछ काल उपरान्त माता-पिता अपने ऐसे ही सन्तानोंको जिन्हें वे साधनासे दूर रखते हैं, उन्हें मेरे पास लेकर आते हैं किन्तु तब तक उनके अनिष्ट शक्तिद्वारा निर्माण किये हुए आवरण और कष्ट दोनों ही बहुत बढ चुका होता है। अतः पालको ! यदि ईश्वरने आपको सात्त्विक सन्तानें दी हैं तो उनकी सात्त्विक रीतिसे लालन-पालन करें एवं उन्हें धर्मपथपर अग्रसर कर अपने धर्मकर्तव्यका निर्वाह करें, उसीमें आपका और आपकी संतानका कल्याण निहित है !- तनुजा ठाकुर (२८.९.२०१७)
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