राष्ट्रभाषा


स्वतन्त्र भारतके सात दशकोंकी एक ‘उपलब्धि’ यह भी है कि आजतक इस देशके सभी राज्योंके लोग राष्ट्रभाषा हिन्दी न ढंगसे बोल पाते हैं, न लिख पाते हैं और न ही पढ पाते हैं ! दक्षिण भारतमें तो राजनीतिज्ञोंकी कुत्सित मानसिकताके कारण वहांके अनेक लोगोंद्वारा हिन्दी भाषाको घृणाकी दृष्टिसे देखा जाता है । आजके सत्तालोलुप एवं निकृष्ट राजनीतिज्ञोंको इतना भी समझमें नहीं आता है कि सम्पूर्ण राष्ट्रको एक सूत्रमें बांधने हेतु एक राष्ट्रभाषाका होना अति आवश्यक है । ख्रिस्ताब्द २०१२ में जब मैं धर्मयात्राके मध्य चेन्नईमें थी तो एक दिवस एक टैक्सीयान चालकसे हिन्दीमें कहा कि मुझे अमुक-अमुक स्थान जाना है तो वह अभिनय कर रहा था कि उसे मेरी भाषा समझमें नहीं आ रही है, जब उसकी इस मानसिकताको देख, मैं दूसरे वाहनमें जानेके लिए आगे बढी तो वह हिन्दीमें मुझे अपने वाहनमें बैठने हेतु कहने लगा । राष्ट्रभाषा हिन्दीकी, अपने ही स्वतन्त्र देशमें यह दुर्दशा देख, मन क्रन्दन करता है और हिन्दू राष्ट्रकी स्थापना, शीघ्र अति शीघ्र करने हेतु हमारा संकल्प और दृढ हो जाता है – तनुजा ठाकुर



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