स्वतन्त्रता पश्चात हमारे राज्यकर्ता इस देशकी प्रतिष्ठाको बचाने हेतु कभी प्रयत्नशील नहीं रहे; क्योंकि शास्त्र कहता है, ‘भारतस्य प्रतिष्ठे द्वे संस्कृतम् संस्कृतिस्तथा’ अर्थात भारतकी प्रतिष्ठा दोमें निहित है, संस्कृति और संस्कृत । यह सर्व विदित है कि इस देशके राज्यकर्ताओंने संस्कृत भाषाको एक षड्यन्त्र अन्तर्गत इस देशकी प्रजासे विमुख रखा; क्योंकि उन्हें ज्ञात था कि भारतीय संस्कृतिका ज्ञान संस्कृतके बिना असम्भव है; अतः उन्होंने इस आधारको ही नष्ट करनेका प्रयास किया और आज स्वतन्त्रताके सात दशक पश्चात यह सुसंस्कृत भाषा, अब बुद्धिजीवियोंके मध्य भी न बोली जाती है और न ही समझी जाती है । इसके साथ ही आजके राज्यकर्ता पाश्चात्यवाद एवं मुसलमानोंका तुष्टिकरण कर, इस दैवी वैदिक संस्कृतिको नष्ट कर रहे हैं । इस स्थितिको परिवर्तित करने हेतु हिन्दू राष्ट्रकी स्थापना करना अपरिहार्य हो गया है; क्योंकि हिन्दू राष्ट्रमें संस्कृत एवं वैदिक संस्कृति दोनोंको राज्याश्रय मिलेगा एवं इनका संवर्धन होगा ।– तनुजा ठाकुर
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