सात्त्विक जीवन प्रणाली कैसे करें व्यतीत ? (भाग – ८)


अ. स्नानके पश्चात् वस्त्र धारण कर सर्वप्रथम स्त्री और पुरुष दोनोंने ही तिलक (स्त्रियोंके टीका) धारण करना चाहिए। हमारे दोनों भोहोंके मध्यमें आज्ञा चक्र होता है,  इस चक्रमें सूक्ष्म द्वार होता है जिससे इष्ट और अनिष्ट दोनों ही शक्ति प्रवेश कर सकती है, यदि इस सूक्ष्म प्रवेश द्वारको हम सात्त्विक पदार्थका लेप एक विशेष रूपमें दें तो इससे ब्रह्माण्डमें व्याप्त इष्टकारी शक्ति हमारे सूक्ष्म देहमें आकृष्ट होती हैं और इससे हमारा अनिष्ट शक्तियोंसे रक्षण भी होता है। तिलक लगते  समय चन्दन, बुक्का, विभूति, हल्दी-कुमकुम जैसे सात्त्विक पदार्थोंका प्रयोग करना चाहिए। स्त्रीयोंने गोल और पुरुषोंने खडे तिलक लगाने चाहिए, यदि कोई विशेष सम्प्रदायसे सम्बन्धित हों तो उसके अनुसार तिलक लगाना चाहिए। तिलक लगानेसे मन शान्त रहता है, अनिष्ट शक्तियोंसे रक्षण होनेके कारण और देवत्व आकृष्ट होनेके कारण हमारे चारों ओर सूक्ष्म कवचका निर्माण होता है। पूर्वकालमें कभी भी किसी भी आयु वर्गके हिन्दू स्त्री या पुरुषका कपाल बिना तिलकके नहीं होता था; किन्तु आजकल तो विवाहित स्त्रियां भी अपने इस सौभाग्य अलंकारका परित्याग कर चुकी हैं और पुरुषवर्ग तो शर्ट-पेंटके साथ इसे धारण करनेमें लज्जाका अनुभव करते हैं और विद्यार्थीवर्गको तो इसे कोई लागना ही नहीं सिखाता है।
आजकल कुछ स्त्रियां टीवी धारावाहिक या चलचित्रको देखकर विचित्र आकारके टीका लगती हैं, उससे भी इन्हें आसुरी शक्तियोंका कष्ट होता है। उसी प्रकार आजकल विपणि(बाजार)में उपलब्ध प्लास्टिककी या अन्य पदार्थकी बनी-बनाई बिन्दियां जो मिलती हैं उन्हें चिपकानेसे भी कोई लाभ नहीं होता; क्योंकि उसमें न तो देवत्वको आकृष्ट करनेकी क्षमता नहीं होती और न ही वे अनिष्ट शक्तियोंसे हमारा रक्षण कर पाती हैं। वस्तुतः पूर्वकालके सर्व हिन्दू साधक होते थे, सात्त्विक जीवन प्रणाली व्यतीत करना, यह उनकी वृत्तिमें अंकित होता था अतः वे सदैव ही तिलक धारण किए रहते थे; क्योंकि उहें ज्ञात था कि तिलक धारण करना अध्यात्मिक दृष्टिसे अति आवश्यक होता है।
आ. पूजा करते समय सात्विक वस्त्र धारण करना चाहिए, इससे हम देवताओंसे प्रक्षेपित होनेवाले दैवी स्पंदनोंको अधिक प्रमाणमें ग्रहण कर सकते हैं। पूजा करते समय स्त्रियोंने साडी और पुरुषोंने धोती पहनना चाहिए। यदि संभव हो तो पूजाके वस्त्रको मात्र पूजाके समय ही धारण करें, इससे वस्त्रमें भी सात्त्विकता निर्माण होती है और पूजा करते समय मन एकाग्र रहता है; किन्तु वृत्ति तमोगुणी होनेके कारण आज स्त्री और पुरुष दोनोंको ही सात्त्विक वस्त्रोंसे जैसे प्रत्युर्जता(एलर्जी) हो गयी हो, वे उसे धारण करना ही नहीं चाहते हैं। पूजाके समय वस्त्र सदैव ही सूती या रेशमीके होने चाहिए एवं काले वस्त्र नहीं होने चाहिए। काले वस्त्रको हिन्दू धर्ममें सामान्य व्यक्तिके लिए पूर्णत: वर्जित किया गया है क्योंकि इससे अनिष्ट शक्तियांके स्पन्दन सहज ही आकृष्ट होते हैं। मात्र किसी विशेष संप्रदायसे जुडे व्यक्तिको या मकर संक्रांतिके दिवस ही काले वस्त्रका प्रयोग करनेकी अनुमति है या किसी अध्यात्मविदने किसी कष्टके निवारणार्थ साधनाके समय या किसी विशेष दिवस यदि किसीको उसे धारण करने हेतु कहा हो तो ही धारण करना चाहिए ।
यह सब जाननेके पश्चात् अब आप समझ ही रहे होंगे कि हम हिन्दू प्रातःकालसे रात्रि तक अपनी प्रत्येक कृतिको तमोगुणसे भारित कैसे करते हैं ? ऐसेमें यदि इस देशमें अनेक शारीरिक और मानसिक रोग महामारीके समान फैल रहे हों तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए !
– तनुजा ठाकुर  (क्रमश:)



Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

सम्बन्धित लेख


विडियो

© 2017. Vedic Upasna. All rights reserved. Origin IT Solution