अ. आजकल अनेक व्यक्ति भोजन करते समय जूठन छोड देते हैं, वह एक प्रकारसे ब्रह्मरूपी अन्नका तिरस्कार करना है। भोजनमें मीनमेख(कमियां) निकालनेसे भी भोजनकी अवमानना होती है, जो प्राप्त हुआ है, उसे कृतज्ञताके भावसे ग्रहण करनेसे मनुष्यके सभी स्थूल एवं सूक्ष्म देहोंका पोषण होता है। भोजन, इस शरीरको स्वस्थ एवं सात्त्विक रखनेका एक माध्यम है और शरीर, मोक्षप्राप्ति एवं समाज कल्याणका माध्यम है; अतएव इसी भावसे भोजन ग्रहण करना चाहिए।
आ. भोजन कितना करना चाहिए ?, इस सम्बन्धमें आदर्श भोजनकी प्रक्रिया कहती है कि इसे उतना ही लेना चाहिए जिससे आधा पेट भर जाए, एक चौथाई जलके लिए रखें और शेष तीनों दोषों और वायुके लिए होना चाहिए । इसलिए आयुर्वेद कहता है, कभी भी पेट भरके भोजन न करें, यह स्वास्थ्यके लिए हानिकारक होता है । – तनुजा ठाकुर (क्रमश:)
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