सात्त्विक जीवन प्रणाली कैसे करें व्यतीत ? (भाग – ५)


अ. नित्य कर्मसे निवृत्त होकर सूर्योदयसे पूर्व स्नान करना, वह भी शीतल जलसे उत्तम होता है, इससे कुछ कालके (२० मिनिटके) लिए सात्त्विकतामें वृद्धि होती है इसीलिए स्नानके पश्चात् हमें अच्छा लगता है या स्फूर्ति मिलती है। उष्ण (गरम) जलकी अपेक्षा शीतल जलसे स्नान करनेसे हमें अधिक प्रमाणमें आध्यात्मिक लाभ मिलता है क्योंकि शीतल जलमें आध्यात्मिक उपाय (स्पिरिचुअल हीलिंग) करनेकी क्षमता, उष्ण जलकी अपेक्षा अधिक होती है । यदि किसीको वात या कफका अत्यधिक कष्ट हो या शिशिर ऋतु (सर्द ऋतु) हो तो ही हलके उष्ण जलसे स्नान किया जा सकता है अन्यथा शीतल जलसे स्नान करना, शारीरिक एवं आध्यात्मिक दृष्टिसे अधिक पोषक होता है।
आ. स्नानगृहके फुहारेमें (शावर) खडे होकर स्नान करना, स्नान न करने समान ही है क्योंकि पालथीके मुद्रामें बैठकर शीतल जलसे स्नान करनेसे सात्त्विकतामें वृद्धि होती है, वहीं फुहारेमें (शावर) खडे होकर स्नान करनेसे स्नानसे उत्पन्न होनेवाली सात्त्विकता नष्ट हो जाती है क्योंकि फुहारेसे गिरनेवाले जलकी बूंदोंके भूमिपर होनेवाले आघातसे उत्पन्न प्रतिघातसे पातालकी काली शक्ति भारित हो जाती है जो एक बादल समान हमारे कटिप्रदेश (कमर) तक सूक्ष्म काले तरंग रुपी आवरणके रूपसे घिर जाते हैं किन्तु यदि हम नैसर्गिक झरनेमें स्नान करते हैं तो हमपर आध्यात्मिक उपाय होता है अतः हमारी संस्कृतिमें झरनेमें स्नान करने हेतु तो बताया गया है; परन्तु कृत्रिम फुहारेसे स्नान करना तमोगुणी माना गया है अर्थात् पाश्चात्य संस्कृति पुरस्कृत फुहारेवाला स्नान तमोगुणी होता है  – तनुजा ठाकुर  (क्रमश:)



Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

सम्बन्धित लेख


विडियो

© 2017. Vedic Upasna. All rights reserved. Origin IT Solution